Radhe Maa ki leelaye



परम श्रधेय श्री राधे शक्ति माँ को हाज़िर नाजिर मान कर कहता हूँ की जो कहूँगा सच कहूँगा, सच के सिवा कुछ न कहूँगा / – सरल कवी

Part 16

तभी सीढ़ीया चढ़ते हुये ‘मनमोहन गुप्ता’ दिखाई दिये ! सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहने, तनिक भारी भरकम शरीर और सर पर सफ़ेद चकाचक गांधी टोपी |

मुझे देखकर उनके चेहेरे पर हैरानी  के भाव उमरे, “अरे ! तुम अभी तक इधर ही बैठे हो| कमर में दर्द होने लगा जायेगा ! क्या समझे  ? चलो मेरे साथ |”

में उनके पीछे पीछे सीढिया  चढते हुए फर्स्ट फ्लोर वोटिंग हॉल में प्रविष्ठ हुआ |

एक बड़े से सिनेमा हाल जितने ऊँचे और भव्य सजावट से सज्जित वेटिंग हॉल  में लगभग बीस आदमी बैठने लायक आरामदायक सोफा लगाये गये थे | सामने एक सिनेमा हॉल जैसी बड़ी व्हाइट स्क्रीन लगी थी | जिसके आगे एक बड़ा सा LCD टीवी  सेट भी था | एक तरफ परम श्रद्धेय ‘श्री राधे शक्ति माँ’ की भव्य फोटो सुसज्जित थी | छत पर विशाल गोलाकार सीनरी थी जिसमे नीले रंग में तारो जैसी  कुछ चमक आसमान में रात्रि  का भ्रम पैदा कर रही थी |

“बैठो….? ” मनमोहन गुप्ता एक सोफा में लगभग पसर से गये,’ बैठो, भाई !”

मै तनिक संकुचते  हुए उनसे थोडा फासला बनाते हुए हौले से बैठ गया | एक लड़का फ़ौरन पानी लेकर हाजिर हुआ | मैंने तुरंत पानी का गिलास लिया | में काफी देर से इसकी आवशकता महसुस कर रहा था |

“क्या पिओगे ? ‘ मनमोहन गुप्ता ने अलसाये स्वर में पूछा,”चाय ? कॉफ़ी ?”

“कॉफ़ी”  मैंने पानी पीकर खाली गिलास लड़के की तरफ बढाया, ” बिना शक्कर की!”

उन्होंने लड़के की तरफ देखा | लड़के ने समज जाने वाली मुद्रा में सर हिलाया | और बाई तरफ स्थित दरवाजे से बाहर निकल गया |

मनमोहन गुप्ता ने मेरी तरफ देखा और हौले से मुस्कराये, “कविताओ में रूचि है तुम्हारी?”

‘हाँ”, मैंने सिर हिलाया |

“मैंने बहुत सी कविताए लिखी हैं……………” वो तनिक गंभीर स्वर में बोले|

‘अनेक कवी सम्मेलनो  में शिरकत कर चूका हूँ | मेरे कविताओ के संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं !”

मैंने प्रसंशा और हैरानी  भरे निश्चित भाव से उनकी तरफ ताका |

“अब मेरी नई कविता के कुछ अंश सुनाता हु ! सुनोगे ?”

“‘शोर !”  मै फ़ौरन बोला,”क्यों  नहीं !”

मनमोहन गुप्ता ने कुछ क्षण छत्त की तरफ ताका और फिर विशिष्ट अंदाज में बोले,’ माँ  जो  नही तो कुछ भी नही,  बस माँ  से घर होता है | ”

‘वाह !’ मैंने  दो-तीन बार ढोढी को छाती की तरफ झुकाया ,’ माँ  से घर होता है !”

“सच मनो बेटा |” मनमोहन गुप्ता का स्वर भारी हो उठा, “जब जब दर्शन वाला शनिवार आता है, हमारा पुरे परिवार में जैसे उत्साह उमंग और हर्ष का समंदर लहराने लगता है | देवी माँ  के चरण जब से हमारे घर में पड़े हैं, हम तो धन्य हो गये है | हमारा पूरा परिवार अपने आपको भाग्यशाली समजता है देवी माँ जी की अनंत कृपा हम पर दिन रात बरसती रहती है ! हर पल हर घडी जैसे त्यौहार का सा माहौल बना रहता है ! रोजाना दूर दराज से अनेक माँ के दर्शन के पुजारी आते ही रहते हैं ! घर आये अतिथियों  की सेवा में घर के नौकर चाकर से लेकर सभी सदस्य बिड से जाते है | बाहर से आनेवाली संगत के आलावा भी यहा के बहुत से परिवार देवी माँ  के विशेष दर्शन को आते रहते हैं,  हर वक्त मेला सा लगा रहता हैं ! बहुत अच्छा लगता हैं |”

मैंने सिर हिलाया |

‘कई बार —–‘ मनमोहन गुप्ता सामने घूरते हूए बोले, “देवी  माँ  जी बाहर चले जाते है ! अभी कुछ दिन पहेले दो महीने के लिये पंजाब गये थे, उससे पहेले London – Switzerland  आदि स्थानों पर अपने भक्तो को आशीर्वाद देने गये थे | जब देवी  माँ यहाँ नही होते, तो यूँ  लगता है जैसे सारा संसार सुना सुना है | हलाकि घर में परिवार के सभी सदस्य होते है | नौकर, सेवादार, चौकीदार, वॉचमन, रोसाईये —— वैसे के वैसे ही पुरे के पुरे – मगर —-“

उन्होंने एकदम खाये से स्वर में कहा ‘मगर लगता है घर सुनसान है | कोई रोनक नही | कोई चहल-पहल नही | सभी लोग एक मशीन की तरह अपनी अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे होते हैं | सच पूछो तो दिल लगता ही नही | एक रुखी रुखी बैचनी जैसे हर वक्त घेरे  रहती है ! कोई धंदा सूझता ही नही | कुछ करने को ही नही | न खाने में मन लगता है न कही जाने पर ! और तो और सोना भी ठीक ढंग से नही होता ! समझ सकोगे मेरे फिलिंग को?”

में क्या बोलता ?

“इसलिये………….”मनमोहन गुप्ता ने सर को तनिक नचाते हूए कहा, “मेरी नई कविता का शीर्षक है ……………माँ  से घर बनता है ! ‘

“बहुत सुन्दर |” मैंने ताली बजाने का उपक्रम किया,’ अब समझ में आता है भाई साहब | जब ह्रदय में कोई उथल पुथल होती है तो नई कविता का सृजन होता है | क्या बात कही है | माँ  से घर बनता है |”

“माँ  जो  नही तो कुछ भी नही ………………..

उन्होने हाथ अंदाज से लहराया, “माँ  जो   नही …………..”

“माँ  जो  नही तो कुछ भी नही,
सूना सूना सब कुछ लगता,
इक खालीपन सा हर वक्त ही
उदास मन से उफनता है …….
माँ से घर बनता है |”

(निरंतर …)

Note – प्रिय ‘देवी माँ’ के भक्तो ‘माँ की लीलाए’ हम निरंतर शृंखलाबंध प्रस्तारित कर रहे हैं | इसमें हमने ‘देवी माँ’ के सानिध्य में आने वाले भक्तों के अनुभव को कलमबदध किया हैं | ‘माँ की लीलाये’ आप को कैसी लगी रही हैं इस बारे मैं आप अपनी राय, अपनी समीक्षा, अपना सुझाव हमें निम्न इ-मेल पर भेज सकते हैं |

आप अगर अपने अनुभव,  ‘देवी माँ’ के अपने साथ हुए चमत्कार को सबके साथ बाटना चाहते हैं,  तो हम आपके नाम और पते के साथ इसे पेश करेंगे | आप चाहेंगे तो नाम पता जाहिर नहीं करेंगे आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में 

Sanjeev Gupta
Email – sanjeev@globaladvertisers.in
Part 15

उसकी उम्र लगभग 55 साल होगी, कद थोडा ठिगना, चेहरा गोल, छोटे छोटे बाल | उसने हलके आसमानी कलर की हाफ बाजु की शर्ट और पेंट पहनी थी | ‘देवी माँ’ की दर्शनो  के लिए सीधीयों  में कतार के बीच वह खड़ा फर्श को घुर रहा था | मेरा ध्यान उसकी तरफ आकर्षित इसलिए हुआ क्योंकी वह अपने आप से बाते कर रहा था | कभी वह झुंझलाकर गर्दन हिलाने लगता, तो कभी एकदम मुस्कराने लगता, कभी गुस्से में दात भींच रहा था,  तो  कभी गंभीर मुद्रा में कुछ बड़बड़ाने लगता |

लगातार अपनी तरफ टकटकी लगाये देखता पाकर उसने झेपते से हुए दोनों जोड़कर धीरे से कहा “जय माता दी”|

“जय माता दी, साहेब|”  मैंने हँसा,  “आज कुछ खास उठापटक चल रही आपके भीतर ही भीतर | क्यों?”

“व़ो… यूँही…”  वहा झेपे मिटाने का प्रयास करते हुए जबरन  मुस्कुराया,  “और तुम सुनाओ | बैठ क्यूँ  गए ? थक गए हो ! अभी से ? जवान हूँ प्यारे ! उठो ! हिम्मत करो|”

“अरे नहीं भैई!” अपने पास पड़ी खाली जगह को थपथपाया,  “आप भी बैठो!  दर्शन शुरू नहीं हुए हैं शायद ! लाइन ज्यों की त्यों खड़ी हैं |”

वह, ‘थैंक्यू’  बोलने वाले स्टाइल में होंटों को हिलाकर मेरी बगल में आहिस्ता से बैठे गया |

“क्या बाते कर रहे थे अपने आपसे?”  मैंने सहज स्वर मैं पुछा, “पहले अपना नाम बताइए |”

“मधुकर…. मधुकर नायर | मैं एक बैंक कर्मर्चारी था |…. हूँ |”

“था ?”  मैंने उसकी बात दोहराई “और हूँ !  इसका क्या मतलब हुआ?”

“मतलब तो देवी माँ जाने |” वहा भरे गले से बोला, “लेकिन मानना पड़ेगा | पूज्य राधे शक्ति माँ का नाम हैं बड़ा चमत्कारी |”

” जरा खुल कर बोलिए नायर साहब” मैंने उत्सुकता से पुछा, “आपने क्या चमत्कार देखा?

“मेरे दोस्त |” वहा एकाएक गंभीर हो उठा,  “मैंने पुरे तेतीस साल बैंक में नौकरी की हैं | कितने? 33 इयर | मामूली क्लर्क की पदवी पर लगा था | अपनी मेहनत से, लगन से,  ईमानदारी से काम करते – करते असिस्टंट ब्रांच मेनेजर  की सीट पर पंहुचा | लोग मेरी ईमानदारी की मिसाले देते………. मेरी मेहनत और कार्यक्षमता पर पुरे स्टाफ को नाज था और फिर……….”

एक गहरी साँस लेने के बाद मधुकर नायर बोला, “मेरी अच्छी खासी जिंदगी को ग्रहण लग गया | किसी कर्मचारी ने बैंक में सत्ताएस लाख का घपला किया और इल्जाम मेरे सर पर आ गया…|  कितने का सताइएस लाख का|”

मैंने गंभीर मुद्रा में लगातार ध्यान से उसकी बात सुन रहा था |

“पहले सभी कर्मचारी से पूछताछ हुई | फिर इन्क्य्वारी चालू हो गयी |मुझे सस्पेंड कर दिया गया |

“यहाँ कब की बात हैं ? ”  मैंने सहानभूति भरे स्वर में पुछा |

“लगभग सात वर्ष और पाच महीने हो गये,  मुझे  संस्पेंड हुए |” मधुकर नायर ने मेरी आँखों में झाँका, “मुझ  पर बेईमानी  का इल्जाम लगा | लोग मुझे  अजीब निगाहों से देखने लगे मेरे रुतबा,  मेरे इज्ज़त की धज्जिया उड़ गयी | शहर में कही आना जाना तक मुश्किल हो गया | यार दोस्तों ने पीठ दिखाई | रिश्तेदार सगेवाले मेरी बाते बनाने लगे | … मतलब यह हैं मित्र मेरे,  मैं ज़माने भर मैं तमाशा बन गया | मेरी  हालत विक्षितों की सी  हो गई | खाना पीना हराम | ऊपर से मेरे ऊपर केस हो गया|  हप्ते महीने कोर्ट कचहरी का चक्कर |  वकीलों की फ़ीस | सब कुछ बंटाधार हो गया |”

मैंने उसकी हाथ को थपथपाकर धाडस  बंधाया |\

“मैं थक गया था | मैंने टूट गया था |  मेरा विश्वास,  मेरा धैर्य भी जवाब देने लगा था  |” मधुकर नायर ने भरे गले से कहा, “फिर, मैं एकबार यहाँ ‘श्री राधे माँ’ भवन मैं हो रही चौकी में आ गया | जब वक्ता लोगों ने ‘श्री राधे शक्ति माँ’  की गुणगान बरवान किया, तो मैं भी दर्शन को चला गया | मैंने ‘देवी माँ’ के दरबार में अर्जी लगाइ,  फिर निरंतर सात चौकी भरी |”

“फिर…?” मैंने व्यग्र स्वर मैं पुछा |

“फिर… सातवी चौकी  के बाद …..” मधुकर नायर की आवाज में जोश आ गया, ” एकाएक जैसे देवी माँ ने चमत्कार किया |  बैंक मैं की गई जालसाजी के असली गुनहगार पकड़ में आ गये | वे तीन जन थे | एक क्लर्क,  एक काशियर  और एक ग्राहक |  तीनो की शिनाख्त हो गयी | उन्होंने गुनाह कबुल कर लिया | अभी परसों …..परसों मैंने बैंक कर्मर्चारी था,  लेकिन कल मुझे फिर से अपनी सर्विस की बहाली का आर्डर मिल गया | मुझे अपने नौकरी पर फिर बुला लिया गया हैं |  बैंक ने लिखित रूप से मुझसे माफी मांगी है| इसी दौरान मुझे असिस्टंट से ब्रांच मेनेजर भी बना दिया गया हैं | मेरे भाई! इसलिए मैंने कहा मैं  बैंक कर्मर्चारी था, हूँ | यानि सोमवार से… आज ‘देवी माँ’ के दर्शन करूँगा | आशीर्वाद लूँगा |  कल तान कर सोऊंगा और फिर सोमवार से मधुकर नायर, ब्रांच मेनेजर की सीट संभालेगा |  मैं तो इसे सिर्फ ‘देवी माँ’ का चमत्कार मानता हूँ |  आपका क्या कहना हैं ?”

मैंने मुठी बंद कर हवा में लहराई ” हंड्रेड  परसेंट ‘देवी माँ’ का चमत्कार |”

मधुकर नायर ने संतुष्टि से सीर हिलाया |
(निरंतर …)

Part 14


आप कभी  परम श्रधेय ‘श्री राधे शक्ति माँ’ के, ‘श्री राधे माँ भवन’ गये हो, तो आपको बात दू मैं इस वक्त  सीढ़ीयो द्वारा उपरी मंजली की तरफ जाने वाले रस्ते में कोई आठ दस सीढियों के बाद,  लिफ्ट के ठीक लेफ्ट साइड में स्थित, विशाल विंडो की तनिक उमरी जगह पर,  उकड़ होकर बैठा हुआ था | यहाँ से ग्राउंड फ्लोर  स्तिथ विशाल हॉल में अच्छी तरह झाँका जा सकता हैं | पहली मंजिल की तरफ जाने वाली लगभग सात-आठ सीढियों पर खड़े माता के पूजारियो को भी देखा जा सकता हैं |

मेरे पास बैठे बुजुर्ग सेवादार ने उठते हुए मुझसे कहा “लाइन में लग जाओ, पांच माला स्थित गुफा तक पहुँचने में तुम्हे पूरा एक घंटा लग जायेगा | इससे  ज्यादा भी लग सकता हैं |”

“कोई बात नहीं प्रभु|”  मैंने बेफिकीर से हाथ हिलाया,  “अब जब आ ही गये हैं तो देवी माँ का आशीर्वाद लेकर ही जायेगे | एक घंटा बाद ही सही! दो घंटा बाद भी चलेगा|”

जैसे ही सेवादार उठा एक अन्य बुजुर्ग जिनकी उम्र सत्तर से ऊपर ही होगी, आहिस्ता  से मेरे बगल में बैठ गये | उनके हाथ में एक चॉकलेट का बड़ा सा डिब्बा था | मुझे डिब्बे की तरफ तकते देख कर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ” देवी माँ के लिए है | उन्हें चॉकलेट बहोत पसंद है |

“गुड” मैंने तनिक सरक कर उन्हें आराम से बैठने का इशारा किया |

“मैं जब भी आता हूँ………” वह आत्मविभोर स्वर में बोले, “देवी माँ के लिए चॉकलेट ही लाता हूँ | मैंने जब जब भी ‘देवी माँ’ के दर्शन किये,  मुझे वो एक छोटी सी कंजक  के रूप में दिखाई दी | मैं जैसे ही गुफा में प्रवेश करता हूँ  मुझे  ऐसा  लगता हैं,  जैसे वो मेरी ही प्रतीक्षा कर रही हो | एकदम बच्चो  जैसा मुस्कुराहट  उनके अधेरो पर खेलने लगते हैं | बच्चो जैसी ही उतावली मुद्रा में वो हाथ बढाकर मुझसे चॉकलेट मांगती हैं…………………..” उनका गला  भर आया |

एक क्षण रुकने के बाद वह पुलकित स्वर मैं बोले, “जैसे ही ‘देवी माँ’ चॉकलेट लेती हैं | मेरे मन में एक असीम आनंद भर उठाता हैं |”

मैंने उनकी आखों में छलक उठने को आतुर पानी देखा |

“मेरा नाम सत्य प्रकाश हैं| …….सत्यप्रकाश गर्ग …” वह अपने आप में खोये से धीर धीरे बोल रहे थे | “घर में ‘देवी माँ’  की कृपा से दिया सब कुछ हैं | मैं तो पंद्रह रोज का बेसब्री से इंतजार करता हूँ,  की कब ‘देवी माँ’ के दर्शनों का दिन आये | ………तुमने देवी माँ से कभी  कुछ माँगा ?”

मैंने इन्कार में सीर हिलाया |

“माँगना भी मत”,  वह गंभीर मुद्रा बनाकर बोले, ” देवी माँ  अंतर्यामी हैं | अच्छा बताओ तुमने ‘देवी माँ’ के किस रूप में दर्शन किये हैं?”

मैं कुछ बोलू उससे पहले ही वह स्वतः बोलने लगे, “पहले तो यहाँ जान लो की आखिर ‘देवी माँ’ क्या हैं? कोई संत? कोई अवतार? कोई ऋषि ज्ञानी?”

 मैंने अनिश्चित भाव से सीर हीलाया, ” आखिर ‘देवी माँ’ हैं क्या?”  वह एक एक शब्द पर जोर देते हुए बोले, “सुनो बेटा, ‘देवी माँ’ के बारे में अपनी कोई  भी राय निश्चित करने से पहले,  उनके बारेमें अच्छी तरह जानना जरुरी हैं| देश – विदेश में उनके लाखो अनुयायी हैं | अब यही देख लो | हजारो की संख्या में हाजिर लोगो को गौर से देखो | इनमे टी वि आर्टिस्ट है, वकील है, डॉक्टर है, बड़े बड़े उद्योगपति है, छोटे-छोटे हाथ ठेला लगाने वाले भक्त हैं | साधू समाज के लोग, सरकारी तंत्र के लोग, बड़े-बुड्ढे, बच्चे-जवान…………. न जाने कहाँ कहाँ से आ रहे हैं| इनको किसी ने निमंत्रण भेजा हैं क्या?  या इनको फोर्स किया हैं,  की यह तुमने आना ही है?  नहीं ! नहीं ! कुछ तो है,  की इन सबके दिलो  में . ‘देवी माँ’ के दर्शनों की इतनी लालसा है, की भारी बारिश में भी लोगो का हुजूम  दर्शनों  के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहा हैं | सुनो मेरे बच्चे ! यहा साहूकारी नहीं चलेगी | यहा पद और आहोदा नहीं चलेगा | यहा रुतबा  दिखाने  की जरूरत नहीं|”

वह एक क्षण के लिए रुके, जीभ फिराकर अपने होंटों को तनिक गिला करने के बाद वह बोले, “यहा अगर आना है,  तो दीन बनकर आओ | सवाली बन कर आओ | झुकना सिख कर आओ, विश्वास की ज्योत मन में जगाकर आओ | आशा की डोर थामकर आओ | कुछ पाने की इच्छा लिये आओ | मन की अशुधि और अहंकार को घर पर छोड़कर आओ | तब तुम्हे मालूम होगा की ‘देवी माँ’ किस बात पर रिझंती शक्ति है | याद रखना,  यहा भूलकर भी किन्तु के भाव लेकर मत आना टाइम ख़राब करोगे | अगर कोई अपने आपको धुरंदर समझे  और सोचे की मैं ‘देवी माँ’ की परीक्षा लू | तो यह उसकी भूल होगी | ‘देवी माँ’  परीक्षा देती नहीं,  परीक्षा लेती है !”

(निरंतर…)


Note – प्रिय ‘देवी माँ’ के भक्तो ‘माँ की लीलाए’ हम निरंतर शृंखलाबंध प्रस्तारित कर रहे हैं | इसमें हमने ‘देवी माँ’ के सानिध्य में आने वाले भक्तों के अनुभव को कलमबदध किया हैं | ‘माँ की लीलाये’ आप को कैसी लगी रही हैं इस बारे मैं आप अपनी राय, अपनी समीक्षा, अपना सुझाव हमें निम्न इ-मेल पर भेज सकते हैं |

आप अगर अपने अनुभव,  ‘देवी माँ’ के अपने साथ हुए चमत्कार को सबके साथ बाटना चाहते हैं,  तो हम आपके नाम और पते के साथ इसे पेश करेंगे | आप चाहेंगे तो नाम पता जाहिर नहीं करेंगे आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में 

Sanjeev Gupta
Email – sanjeev@globaladvertisers.in
Part 13
मैं अभी छोटी माँ और टल्ली बाबा यानि गौरव कुमारजी के बारे में सोच रहा था की दर्शन करने वाली संगत ऊपर की और बढ़नी शुरू हो गयी और वे दोनों महिलाये मोड़ मुड़ने के बाद दृष्टि से ओंज़ल हो गई |
 तभी डार्क- ग्रे कलर का सफ़र सूट पहने, सर पर लाल रुमाल बंधे, लगभग ६०-६२ वर्षीय एक सेवादार मेरी बगल में आकर उकड़ बैठ गया . उसने दोनों हाथो से अपनी पिंडलिया दबाने का उपरक करते हुए मेरे तरफ एक फीकी मुस्कान के साथ देखा |
“लगता है थक गए हो अंकल !” मैंने हाथ आगे बढ़ाये, “में पाँव दबा दू?”
“अरे नहीं यार !” उसने मेरी कालिया थमते हुए कहा, ” में तो बस यूँ ही तुम्हे बैठे देख यहाँ आ गया .. दर्शन के लिए उपदर क्यों नहीं जा रहे हो?”
“वो क्या है ना अंकल!” मैंने ठोढ़ी खुजलाते हुए कहा, “थोड़ी भीड़ कम हो जाये तो खुले दर्शन करना चाहता हूँ | साथ में माता की चौकी का आनंद भी ले रहा हूँ | आप कब से सेवा कर रहे हो?”
“याद नहीं….” वह सोचने लगे, “शायद पांच साल से … छह  भी हो गये होंगे|
“अंकल” मैंने उनके निकट सरकते हुए तनिक धीमे स्वर में पुछा, “मेरी कुछ पर्सनल समस्या है. दो ‘माँ की भक्त’ यहाँ आपस में छोटी माँ के बारे में चर्चा कर रही थी… आप थोडा विस्तार में  बता सकते है ‘छोटी माँ’ के बारे में?”
“देखो बेटे” वह आत्मीय स्वर में बोले, “निचे लगे किसी भी होअर्डिंग पर आपको टल्ली बाबा यानि गौरव कुमार का मोबाइल नंबर मिल जायेगा | तुम गौरव कुमार से मुलाकात का समय मांग लो. ‘छोटी माँ’ परम श्रधेय पूज्य राधे माँ का ही एक स्वरुप है | आपको यहाँ या तो सुबह 6 बहे तक या फिर शाम को 6 -7 बजे .. जो भी टाइम आपको मिले, आना  है | ‘छोटी माँ’ का आसन एक अलग कमरे में लगता है. वह सिवाय ‘छोटी माँ’ के दूसरा कोई भी नहीं होता | आप जो भी पूछना चाहे, वह बात आप ‘छोटी माँ’ से कहिये. खुल कर कहिये, तुम्हरे द्वारा कही बात या तुम्हारा परिचय अगर आप छाए तो एकदम गोपनीय रहेगा | यानि की आप की तकलीफ  को ‘छोटी माँ’ सुनेगी | गौर से सुनेगी | और तुम यकीं करो, काफी हाड तक तो ‘छोटी माँ’ ही तुम्हारी समस्या का निवारण कर देगी | उसके बाद भी तुम्हारे बार ‘देवी माँ’ तक पहुचेगी |”
“यह ‘छोटी माँ’ के वचन कब कब होते है?” मैंने जिज्ञासा भरे स्वर में पुछा |
“यह तो संगत पर निर्भर है… ” वह कंधे  उचका कर बोला, “अगर संगत की संक्या अधिक रहती है तो हफ्ते में दो बार, नहीं तो एक बार तो निश्चित है ही |”
” .. ‘छोटी माँ’.. कुछ प्रवचन या सत्संग करती है?” मैंने तनिक गर्दन को तिरछा किया |
” ‘छोटी माँ’ प्रत्येक आये हुए भक्त की बात सुनती है |”  वह थोडा तरंतुम भरे स्वर में बोला,  ” देखो बच्चे | आज जिसे देखो, वह अंदर ही अंदर किसी न किसी बात से परेशां है | किसी की परेशानी बड़ी है तो किसी की छोटी | बेटा, चेहरे पर मत जाना | हर खिला हुआ, चमकता हुआ चेहरा दिखने में तो यूँ लगेगा की यार इस आदमी के जैसा सुखी और खुशहाल शायद कोई नह है | मगर अंदर के किसी कोने में कही न कही एक टीस, एक गम, एक निराशा उसे निरंतर कचोटती रहती है | बेटा ! एक बात और ज़िन्दगी में एक बात अपने दिमाग में कील की तरह गाडलो | अपने दुःख, अपनी तकलीफ, कभी अपने लगने वाले लोग, को मत बताना | अपने रिश्तोदारो सगेवाले, को तो हरगिज़ नहीं बताना |सुनो, ये दुनिया ऐसी है बेटा | तुम्हारा कोई कितना भी नजदीकी क्यों न हो, 70 % लोगो को आपकी तकलीफ से कुछ लेना देना नहीं होता | बाकि बजे 30 % आपकी तकलीफ सुनकर ऊपर से सहानभूति जताएंगे मगर भीतर ही भीतर पुलकित होंगे की ठीक हुआ, इसके साथ ऐसा ही होना चाहिए था |
में मंत्रमुग्ध उसका चेहरा तक रहा था |
“अपनी ‘छोटी माँ’ से कहो |” वह पुरजोर शब्दों में बोला, ” ..’छोटी माँ’  न केवल आपकी तकलीफ को गौर से सुनेगी बल्कि उसके निवारण का रास्ता भी बतायेंगी | और फिर जब आपकी बात ‘छोटी माँ’ तक पहुँच गयी, समझो ‘देवी माँ’ तक पहुँच गयी |”
“फिर उसके बाद………….. ”  मैंने उसकी आखों में झाँका |
“एक तारा बोले… ” वह जोर से  हँसा, ” फिर उसके बाद ‘देवी माँ’ जाने भाई | और जब ‘देवी माँ’ पर विश्वास है.. भरोसा है.. तो बाकि क्या रह गया ? मौजा ही मौजा |”
वह टल्ली बजने लगा |
(निरंतर …. )

Note – प्रिय देवी माँ के भक्तो ‘माँ की लीलाए’ हम निरंतर शृंखलाबंध प्रस्तारित कर रहे हैं | इसमें हमने ‘देवी माँ’ के सानिध्य में आने वाले भक्त के अनुभव को कलमबदध किया हैं | माँ की लीलाये आप को कैसी लगी रही हैं इस बारे मैं आप अपनी राय, अपनी समीक्षा, अपना सुझाव हमें निम्न इ-मेल पर भेज सकते हैं | आप
अगर अपने अनुभव,  ‘देवी माँ’ के अपने साथ हुए चमत्कार को सबके साथ बाटना चाहते हैं,  तो हम आपके नाम और पते के साथ इसे पेश करेंगे | आप चाहेंगे तो नाम पता जाहिर नहीं करेंगे आपकी बहुमूल्य प्रत्रिक्रिया की प्रतीक्षा में 
Sanjeev Gupta
Email – sanjeev@globaladvertisers.in

Upcoming Chowki – Next chowki is on 13th August, 2011 – For further details Please visit – http://shriradhemaa.blogspot.com/p/shri-radhe-maa-chowki-details.html
Part 12

  “बहुत अच्छे !” मेरे कानो में एक महिला स्वर गूंजा |

मैंने हडबडा कर सर घुमाया |

तालिया बजाने का उपक्रम कर रही एक दर्शनार्थी महिला मेरे पीछे कड़ी शिव चाचा के विचार सुन कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही थी |

मेरे एकाएक घुमने से वह भी मथोडा हडबडा कर पीछे सरकी ! दर्शानोके के लिए ऊपर जा रही थी संगतों की कतार में खड़ी एक अन्य महिला से वह टकराते बची |

उस महिला की उम्र लगभग 50  के करीब होगी हलके ग्रीन कलर का पंजाबी सूट पहने उस महिला के हाथ में एक थैली थी जिसमें से एक लाल चुनरी का थोडा सा हिस्सा बहार उभरा दिखाई दे रहा था | थैली में शायद कुछ और भी उपहार थे जो ‘देवी माँ’ को भेटे करने थे |

लाइन में पहले से खड़ी महिला ने थोडा सरक कर उस महिला को स्थान दिया,  जो शिव चाचा की बात कर रहे थी |

“बहुत उचित और जरुरु व्यवस्था हुई है |” थैली वाली महिला ने दो तीन बार दाए बाए सर हिलाया , “इसकी जरुरत भी थी |”

दूसरी महिला जो लगभग चालीस वर्ष की थी, तनिक दुबली पतली मगर अच्छे परिवार की सदस्य लग रही थी, उसने सहज भाव से पुछा, ” आप कहा से आई है, बेहेन ?”

“घाटकोपर से ….”थैली वाली महिला बोली, “मेरे नाम अर्पिता मूलचंदानी है..| मैं हर दर्शनों के दिन आती हूँ |”
” मैं बांद्रा से आई हूँ !” दुबली पतली महिला ने अपना हाथ आगे बढाया, ” मेरा नाम नीलिमा है | नीलिमा शर्मा|”
“नीलिमा …..” अर्पिता ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया, “आपको शिव चाचा द्वारा बताई व्यवस्था कैसी लगी …”
“ठीक है …” नीलिमा सपाट स्वर में बोली, ” ये लोग यहाँ व्यवस्थापक है | जैसा करेंगे हम दर्शानार्थोने को वैसे ही करना पड़ेगा ना |”

“वो बात नहीं है…” अर्पिता ने सर झटका, ” देखो! यह कार्ड के कलर द्वारा प्रत्येक शनिवार को दर्शन लाभ प्राप्त करने की व्यवस्था का मैं तो पुरजोर समर्थन करती हूँ | पूछो क्यों ? देखो मैं घाटकोपर से शाम ५-६ बजे के करीब चलकर यहाँ लगभग आठ – सादे आठ बजे पोहोचती हूँ  | कई बार नौ भी बज जाते है | लाइन में लगने के बाद मुझे लगभग 800 या या इससे उपार का नंबर मिलता है | आप मानेगी ? पिचली दफा मैंने रात को डेढ़ बजे दर्शन किये | फिर भंडारा लिया | घाटकोपर में वापिस घर पोहोचते पोहोचते मुझे सुबह के चार बज गए | इस व्यवस्था से में दर्शन जल्दी पा जाउंगी | लाइन में अधिक देर खड़े रहना नहीं पड़ेगा | ज्यादा गर्दी नहीं होने के कारन ‘देवी माँ’ के दर्शन भी आची तरह से होंगे | भाई मेरे को तो यह व्यवस्था एक दम ठीक लगी … क्यूँ भैया?”
महिला ने मेरे तरफ आशाविंत निगाहों से देखा |

“मेरे ख्याल से… ” मैंने अनुमोदन भरे स्वर में कहा, ” इस व्यवस्था का सभी का समर्थन करना चाहिए |”
उसके चेहरे पर संतुष्ठी के भाव प्रगट हुए | अर्पिता ने होंठो ही होंठो में मुझे thank You और सीढियों के ऊपर की तरफ झाँका |

“अर्पिता जी …” नीलिमा ने तनिक चिंतित स्वर में कहा, ” मेरी कुछ घरेलु परेशानिया है, जिससे में ‘देवी माँ’ को अपने मुह से बताना चाहती हूँ | मगर मुश्किल ये है, गुफा में प्रवेश करने के बाद एक तो वह सांगत काफी बड़ी तादाद में होती है, ऊपर से सेवादार भी ज्यादा रुकने से मनाई करते है | ”

“आप एक काम करे”, अर्पिता ने भवे सिन्कोड़ी, “छोटी माँ से अपनी बात क्यूँ नहीं कहती?”

“छोटी माँ?” मैंने विचारपूर्वक निगाहों से उन दोनों की तरफ देखा | छोटी माँ कोन है? मैंने मन ही मन में प्रश्न किया |

“छोटी माँ कोन है?” यही सवाल प्रत्यक्ष रूप से नीलिमा ने तनिक व्यग्र स्वर में पुछा |

“छोटी माँ ………….” अर्पिता ने हाथ हिलाते हुए कहा, “परम श्रधेय श्री देवी माँ का ही प्रतिरूप है ”

“वो जो गुलाबी ड्रेस और गुलाबी चुनरी में देवी माँ की बाजु में खड़े रहती है ?” नीलिमा ने तनिक विचारपूर्वक स्वर में पुछा |

“Correct ! एकदम बरोबर पहचाना !” अर्पिता ने सहमति में सर हिलाया, “छोटी माँ को कही गयी बात समझो देवी को ही कही गयी है | देखो, बहेन | ‘देवी माँ’ मात्र दृष्टी मात्र से अपनी सांगत का कल्याण करती है | मगर फिर भी, आपकी कोई गंभी समस्या है .. आप किसी उलझन में है, किसी चिंता में घिरे है … या मन का कोई बोझ आपकी ज़िन्दगी में तकलीफे घोल रहा है, तो पहले यूँ करे ‘गौरव कुमार से समय ले…”

“यह ‘गौरव कुमार’ कं है?” नीलिमा ने पुछा |

अर्पिता ने एक हाथ ऊपर उठाकर मंदिर में घंटी बजने जैसा उपक्रम करते हुए तनिक मुस्कुराकर कहा, “टल्ली बाबा जी|”

Part 11
परम  श्रधेय  पूज्य  श्री  राधे  शक्ति  माँ  को  हाज़िर  नाज़ीर  मान  कर , जो  कहूँगा  – सच  के  सिवा  कुछ  नहीं  कहूँगा  – सरल  कवी 

गायक  सरदूल  सिकंदर  ने  जोरदार  जयकारा  लगवाया , “जयकारा  मेरी  गुडिया  जैसी  प्यारी  ‘राधे  माँजी ’ दा….”

“बोल  सांचे  दरबार  की  जय !” हॉल  में  मौजूद  संगत ने  छत  हिला  देने  वाले  बुलंद  स्वर  में  उत्तर  दिया |

सरदूल  सिकंदर  ने  अपना  गायन  समाप्त   कर  बैठे ने  के  लिए  निचे  ताका. मंच  संचालक  ने  माइक  लेकर  कुछ  कहना   चाह , तभी  शिव  चाचा  मंच  संचालक  के  निकट  पहुंचे |  मंच  संचालक ने  उनका  इशारा  समझा  और  माइक  उन्हें  थमा  दिया|

हॉल  में  सन्नाटा  सा  छा गया | शिव  चाचा के  हाव -भाव  प्रदशित  कर  रहे  थे  की  वह  कोई  महत्त्वपूर्ण  सूचना  देने  वाले  थे  |

मैंने  अपना  सर  विंडो  के  ग्रिल  से  सटा लिया  और  शिव  चाचा की  बात  सुनाने  को  सचेत  हो  गया |

“जयकारा श्री  राधे  शक्ति  माँ जी ’ दा !” शिव  चाचा  ने  सादे  मगर  धीमे  से  स्वर  में  जयकारा  लगवाया |

“बोल  सांचे  दरबार  की  जय !” अपने  दोनों  हाथ  उठाकर  सेवादारो  के  संग  संग  संगत  ने  जयकारा पूरा  किया |

“प्रिय  माता  के  पुजारियों !” शिव  चाचा गंभीर  स्वर  में  बोले , “पूज्य  देवी  राधे  शक्ति  माँ’  के  दर्शनों  के  लिए  हमने  ह़र पंद्रह  दिन  बाद  यानि  एक  शनिवार  छोड़कर  अगले  शनिवार  , यानी  महीने  में  दो  दिन  निश्चित   किये  थे | यह  सिलसिला  पिछले  कई  सालो से  चला  आ  रहा  है |  माँ  राधे  शक्ति  माँ  की  उपासना  पूजा  अर्चाने  करने  वालों  की  संख्या  निरंतर  बढती  जा  रही  है !” 

हॉल  में  तालिया गूंज  उठी |

“हर  पंद्रह  दिनों  बाद  यहाँ  लगने  वाले  भक्तो  के  मेले  में  आज  में  हर्ष  के  साथ  चर्चा  करना  चाहता  हूँ | पिछले  अनेक  दर्शनों  वाले  दिन  हमने  पाया  है  की  निरंतर  बढती  जा  रही  संगत  के  कारन  हम  लोग  व्यापक  व्यवस्था  करने  में  थोड़ी  असुविधा  महसूस  कर  रहे  है | असुविधा  से  मेरा  क्या  मतलब  है,  में  स्पष्ट  करना  चाहता  हूँ |”

शिव  चाचा एक  क्षण  के  लिए  रुके |

थोडा  ख़ास  कर  गला  साफ़  किया  और  फिर  बात  आगे  बधाई , “ हमारे  तमाम  सेवादार , गुप्ता  परिवार  के  सदस्य, गायक  मंडली और  साजिन्दे , वॉचमेन, और  दर्शन  के  लिए  निश्चित  शनिवार की  सुबह  से  ही  तयारी  में  जुट   जाते  है | दूर  दराज  जैसे  की  दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, या  अन्य  प्रांतों से  आने  वाली  संगत  सुबह  से  ही  यहाँ  पहचानी  शुरू  हो  जाती  है | शाम  ढलते  ही  मुंबई  तथा  आस  पास  के  भक्तो  के  टोले  यहाँ  हॉल  में  एकत्रित  होने  शुरू  हो  जाते  है | पिचले  कई  महीनो  से  ‘देवी  माँ ’ के दर्शानोका  सिलसिला  देर  रात  तक  चलता  रहता  है | कई  बार  तो भोर  तक  हो  जाती  है |”

सांगत  ने  करतल  ध्वनि  से  अनुमोदन  किया |

“जय  माता  दी ” शिव  चाचाने हात  उठाकर  शांत  रहने  का  इशारा  किया | हॉल  में  फिर  हल्का  सा  सन्नाटा  च  गया |

‘अब …” शिव  चाचा  ने  तनिक  ऊँचे  स्वर  में  कहा , “ हमने  निर्णय  लिया  है ..की  संगत  को  पंद्रह  दिन  की  बजाय सात दिन  के  बाद  यानिकी  प्रत्येक  शनिवार  को  पूज्य श्री  राधे  शक्ति  माँ  के  दर्शनों  का  लाभ  प्राप्त  होगा |”

उपस्थित  संगतने  हर्षके  साथ  जो  तालिय  बजने  शुरू  की  … वो  कई  देर  तक  निरंतर  बजती  रही |

“लेकिन ….”  शिव  चाचा ने  फिर  शांती  बनाये  रखने  के  लिए  हाथ  हिलाते  हुए  कहा , “अब  दर्शनों  के  लिए  व्यवस्था  में  थोडा  परिवर्तन  किया  गया  है | आप  लोगोको  हॉल  में  प्रवेश  करने  से  पहले  प्रत्येक  दर्शनार्थी  को  एक  कार्ड  दिया  गया  है |”

अनेक  भक्तोने  अपना  कार्ड  हवा  में  लहराया |

“बिलकुल  ठीक !” शिव  चाचाने  एक  उंगली  ऊपर  की, “अब  मेरी  बात  गौर  से  सुनिए | ये  कार्ड  अलग  अलग  रंग  के  है | लाल, नीला, और  पीला, माता  के  भक्तो ! हमने  व्यवस्था  ये  की  है की  अब  प्रत्येक  शनिवार  को  एक  रंग  के  कार्ड  वाले  भगत  ही  दर्शनों  का  लाभ  प्राप्त  कर  पाएंगे|”

हॉल  में  तनिक  निराशाजनक  “होssss …..” की  आवाज  सुनाई दी |

“देखिये !  यह  व्यवस्था  आप  लोगो  की  सुविधा  के  लिए  ही  है !” शिव  चाचा  तनिक  जोर  देकर  बोले , “मसलन  हम  इस  शनिवार  को  यह  घोषणा  करेंगे  की  आनेवाले  शनिवार  को  किस  कलर  के  कार्ड  की बारी  है ! मान  लीजिये  नीले  रंग  वाले  कार्ड  वालो  की  घोषणा  हुई  तो  प्लीज़ …. उस  दिन  नीले  रंग  वाले कार्ड  वाले  ही  दर्शनो  के  लिए  आये | लाल  या  पीले  रंग  के  कार्ड  वालों  को  हॉल में  प्रवेश  करने  की  अनुमति  नहीं  मिलेगी | उसके  अगले  शनिवार  को  नीला  और  तीसरे  शनिवार  को  पीले  रंग  के  कार्ड  वालो  को  दुर्लभ  दर्शन मिलेंगे | यह  क्रम  ह़र  शनिवार  को  चलेगा |”

 हॉल  में  उपस्थित  संगत  में  से  कुछ  लोगो  ने  निराशात्मक  भाव  से  हाथ  लहराए |

“में  आपकी  भावना  को  समजाता  हूँ !” शिव  चाचा  तनिक  खेद  भरे  स्वर  में  बोले, “में  जानता  हूँ  आप  सभी  हर  शनिवार को  दर्शन  के  लिए  लालाचित  है | सज्जनों  और  देवियों  ! में  पहले  ही  निवेदन  कर  चूका  हूँ  की  यह  साड़ी  व्यवस्था  आप  सभी  श्रधालुओं  की  सुविधा  के  लिए  है | आप  तनिक  हमारे  सेवादारों की तरफ  भी  ध्यान  दीजिये| ये  सभी सेवादार और सेवादारियां निष्काम भाव  से  दोपहर  से  ही  व्यवस्था  में  जुट  जाते  है | देर  रात  तक, साड़ी  संगत  को  दर्शन  करवाने  के  बाद  इन  सबको  ‘माँ  श्री  राधे  शक्ति  माँ ’ के  दर्शन  नसीब  होते  है, तब  तक  थकान से  चूर  इन  सेवादारोकी  हालत देखकर किसीको  भी  तरस  आएगा | ये  सेवादार  ही  क्यों , यहाँ  की  व्यवस्था  सँभालने  वाले  सभी  कार्यकर्ताओं  संगमें गुप्ता  परिवार  के  सदस्यों  का  भी  यही  हाल  होता  है | इसलिए  आप सभी  ‘देवी  माँ ’ के  भक्तो  से  मेरी हाथ  जोड़कर  बिनिती  है, प्लीज़ ! प्लीज़ !! आप  इस  हम  सबकी  लाभकारी व्यवस्था  को  कामयाब  बनाना  में हमारा  सहयोग  करे | हम  लोग  शहरभर में  लगे  होअर्दिंग्स  द्वारा  सभी  को  सूचित  करेंगे  की  इस  शनिवार  किस  रंग  के  कार्ड  वाले  का  नंबर  है | इसके  अलावा भी  आप  ‘गौरव  कुमारजी  या  संजीव  गुप्ता से मोबाइल  पर  जानकारी  प्राप्त  कर  सकते  है | आप  लोगोको  यह  जानकार  भी  हर्ष  होगा  की  ‘पूज्य  श्री  राधे  माँ ’ के  लाइव  दर्शन  आप  घर  बैठे  भी  प्राप्त  कर सकते  है | लाखो  ‘पूज्य  श्री  राधे  माँ ’ के  अन्यन्य  भक्त www.globaladvertisers.in वेबसाइट  पर  लॉग इन  करके  यह  लाभ  प्राप्त  कर  रहे  है | 

जिन  लोगो  को  कार्ड  नहीं  मिला  वह  गौरव  कुमारजी  या  फिर  हमारे  अन्य  सेवादारों से  कार्ड  प्राप्त  कर  सकते  है | 

आईये  ! हम  फिर  माता  के  भजनों  का  आनंद  ले ! जिक्र  मेरी  आनंदमई ‘पूज्य  श्री  राधे  शक्ति  माँ ’ का ”

“बोल  सांचे  दरबार  की  जय …..!” संगत  ने  उत्साहपूर्वक  जिक्र  लगाया |

(निरंतर …..)

Part 10

 
शिव चाचा ने हौले से मुस्कुराकर मुझे आश्वस्त रहने का संकेत दिया |  मेरा कन्धा थपथपाया कर  वह  फ़ौरन  निचे  गलियारे  के  पास  अपने  विशिष्ठ स्थान पर जा खड़े हुए मुश्तेद मुद्रा में ! अपनी डयूटी को जिस तन्मयता और लग्न से निभा रहे थे, मैंने मन ही मन उन्हें सलूट किया |

में जिस विंडो की थोड़ी उमरी हुई जगह पर उकडू होकर बैठा था वह से पुरे हॉल का जायजा भी लिया जा सकता था और पहली मंजिल की तरफ जा रही सीढियों पर खड़े श्रधालुओं को निकट से देख सकता था |  लाइन आगे न सरकती देख एक अधेड़ से सज्जन, जिसका शरीर थोडा भारी था, शायद थक से गए थे, वही मेरे निकट फर्श पर बैठ गए |

“आप लाइन में है क्या?”, उन्होंने व्यग्र स्वर में पुछा |

“नो!”, मैंने इनकार में सर हिलाया, “में कुछ आराम से साथ, कुछ जानकारी लेने के बाद, थोड़ी भीड़ कम होने के बाद दर्शन करना चाहता हूँ !”

“फिर तो तीन बजेंगे बच्चू !”, उन्होंने सर हिलाया, “संगत ने अभी तो आना शुरू किया है ! और वह तुम जानकारी के बारे में कह रहे थे | क्या जानकारी चाहते हो पुत्तर ! में यहाँ वर्षो से आ रहा हूँ | नियमित रूप से आ रहा हूँ | बिना नागा आ रहा हूँ |”

“में सोच रहा था ….. ” में विचारपूर्वक स्वर में बोला, ” इतना भव्य आयोजन, इतना इंतजाम, इतनी व्यवस्था, हर पंद्रह दिन के बाद करना कोई मामूली बात हो नहीं है | बहुत सारा खर्चा होता होगा इन सब पर!”

“ठीक जा रहे हो |”, उसने सहमती में सर हिलाया, ” अभी तो पहली मंजिल भी नहीं पहुचे हो……”

“भगत!” मैंने उसकी बात पूरी की, भगत नाम है मेरा ! दर्शनों के लिए पहली बार आया हूँ |”

“भगत जी !”, वह उत्साह भरे स्वर में बोले, ” आपने रोड से लेकर यहाँ तक खड़े सेवादारों की संख्या का अनुमान लगाया है ?”

“यही कोई ….” में सिर खुजलाया, ” बीस पच्चीस..!”

“सौ  के करीब है !” उसने भवे माथे पर ले जाते हुए कहा, ” लेडिज और जेंट्स सेवादा ऊपर दरबार में ‘देवी माँ’ की गुफा से लेकर, हर मंजिल पर दो-दो, तीन -तीन सेवादार ! आप क्या समझते हो इनको कोई तन्खवाह मिलती है?”

मैंने प्रश्नात्मक निगाहों से उसकी तरफ देखा |

“ये सेवादार है !” वह एक एक शब्द पर जोर देते हुए बोले, ” अपनी मर्ज़ी से, अपने काम धंदे छोड़कर यहाँ मात्र सेवा के लिए आते है | इनको पगार नहीं मिलती | लेकिन इनको जो मिलता है, वह दुनिया भर की सभी पगारों से कही ज्यादा है | भगत जी ! सभी को दर्शन करवाने के बाद जब ये ‘देवी माँ’ के सन्मुख होते है और ‘पूज्य राधे शक्ति माँ’ की दया मय दृष्टी इन सेवादारों पर पड़ती है तो उससे अधिक परम आनंद कही नहीं है | किसी चीज़ में नहीं है ! उसके बाद इनको भंडारा मिलता है| भंडारे से याद आया, आपको मालूम है तीसरी मंजिल पर दाई तरफ स्थित टेरेस पर विशाल भंडारे का इन्तेजाम रहता है |”

मैंने इनकार से सर हिलाया |

“गिनो……. ” उन्होंने अपना दाहिना हाथ आगे करते हुए अंगूठे से उँगलियों के पौर दूना शुरू किया, “पाच – छह प्रकार का सलाड और अचार, तीन-चार प्रकार की सब्जी, दाल, कढ़ी, बूंदी का रायता, कभी पाव-भाजी तो कभी पूरी, बेसन की तंदूरी रोटी, गेहू की रोटी, चावल, पुलाव, पिज्जा, भेलपुरी, डोसा, सेवियों की खीर, आईसक्रीम, फलूदा, तीन-चार मीठाइया, फ्रूट सलाड, गुलाब जामुन, जलेबी, रबड़ी, हलवा, चना…………..”

“बस, भाईसाहब, मेरे मुह में सचमुच पानी आने लगा, आप तो किसी भव्य शादी में परोसे जानेवाले मेनू का वर्णन कर रहे हो….”

“यह सब तीसरे माला पर स्थित भंडारे में मिलता है, मेरे बच्चे !” वह श्रद्धा पूर्वक स्वर में बोले, “और सब ‘देवी माँ’ की कृपा से होता है | आप क्या समझते है, गुप्ता परिवार इसके लिए कोई चंदा लेते है? ‘देवी माँ’ की अपार दया से ये सब गुप्ता परवर आयोजित करता है और वह भी निःस्वार्थ !

मैंने हैरानी से सिर हिलाया |

“भगत जी!” वह दोनों हाथ उठाकर छत की तरफ देखने लगा, ” आप नहीं जानते ‘देवी माँ’ की लीला क्या है ! ‘देवी माँ’ कभी उपदेश या प्रवचन नहीं देती ! मालूम है ? वो कभी डिमांड भी नहीं करती ! वो किसी को कुछ करने न करने के लिए रोका – टोका नहीं करती | ‘देवी माँ’ की गुफ़ा में, जैसे ही कोई माँ का सेवक प्रवेश करता है, माँ उसकी तरफ निहारती है, उनकी दिव्य दृष्टि सेवक के भीतर पहुँच कर उसकी तमाम शंका का फ़ौरन भाव लेती  है | जब तक आप ‘देवी माँ’ के सन्मुख पहुचते है | आपकी समस्योंका निदान हो चूका हुआ होता है |”

“बोलो पूज्य ‘राधे शक्ति माँ’ की…….” सीढीयों के ऊपर मोड़ पर खड़े सेवादार ने उसे उठानेका इशारा किया|

“जय!”, वह सज्जन तत्परता से उठे |  कतार आगे सरकी | मोड़ मुड़ते ही वह सज्जन मेरी दृष्टी से ओंझाल हो गए |

में भीतर ही भीतर एक आसिम शांति और अपने आपको हल्का महसूस करने लगा था |….

(निरंतर….)

Part 9

बोरीवली पश्चिम स्थित स्टेशन से सिर्फ पांच सात मिनट के पैदल रस्ते पर चामुण्डा सर्कल से थोडा आगे स्थित सोडावाला लेन में ‘श्री राधे माँ भवन’ के ग्राउंड फ्लोअर स्थित हॉल में माता की चौकी का आयोजन भव्य और धार्मिक भावना से परिपूर्ण, चल रहा था |

में गाने बजाने वाले कलाकारों के निकट बैठा तल्लीनता के साथ भक्ति संगीत में डूबा था, मगर मेरी निगाहे अपने बाई तरफ स्थित उस गलियारे की तरफ थी, जहाँ से पांचवी मंजिल को जाने की सीढिया थी|
गलियारे की निकट आधा दर्जन भर सेवादार दर्शनों के लिए जाने वाले और दर्शनोसे लौटकर आने वाली सांगत को व्यवस्थित ढंग से संभाल रहे थे |

उन सेवादारो के बीच खड़े एक सज्जन की तरफ मेरा ध्यान आकर्षित हुआ | क्रीम कलर का सफारी सूट, चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक, मगर श्रद्धा और समर्पण की झलक भी स्पष्ट नजर आ रही थी | वे दोनों हाथों से धीमे धीमे ताली बजा रहे थे | भजन – गायक के साथ साथ कुछ गुनगुना रहे थे, मगर बीच बीच में सेवादारों को कुछ निर्देश भी दिए जा रहे थे | उनकी मुश्तेदी और कर्तव्यदक्षता के कारन हॉल में काफी अनुशासन बना हुआ था |

सफारी सूट पहने व्यक्तिने मंच पर मौजूद एक कलाकार को हल्का सा इशारा किया| वह फ़ौरन उनके पास पहुंचा| सफारी सूटवाले ने कलाकार के कान में कुछ कहा| समझजाने के भाव से सर हिलाते हुए कलाकार वापिस मंच के निकट पहुंचा |  भजन गायक सिकंदर के कान में कुछ फुसफुसाते हुए कलाकार ने एक अन्य भजन गायक की तरफ इशारा किया |

में एकाएक अपने स्थान से उठा|

व्यवस्थित ढंग से बैठी संगत के बीच जगह बनाते हुए में उस सफारी सूट वाले व्यक्ति के निकट पहुँच | उनके चेहरे पर प्रश्नात्मक भाव प्रगट हुए |

“जय माता दी!”, मैंने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र स्वर में पूछा, ” आपका नाम जान सकता हूँ?”

“शिव चाचा”, वह धीमेसे मुस्कुराये | “लोग मुझे ‘शिव चाचा’ के नाम से पहचानते है | बहुत से लोग ‘जगत चाचा’ भी कहते है | वैसे मेरा नाम ‘जगमोहन गुप्ता’ है | गुप्ता परिवार का सदस्य हूँ | ‘देवी माँ’ का सेवक हूँ|

“शिव चाचाजी !”, मैंने थोडा झुक कर धीरेसे कहा, “में आपको लगभग तीन घंटे से यूँ ही खड़ा देख रहा हूँ !”

“देवी माँ की सेवा में ……” शिव चाचा समर्पण भाव से बोले, ” …साड़ी उम्र खड़ा रह सकता हूँ | एक पाँव पर भी |”

मैंने प्रशंसात्मक निगाहों से उनकी तरफ देखा, ” शिव चाचा ! में थोड़ी जानकारी हासिल करना चाहता था……….”

” आईये ….” एकदम विनम्र भाव से बोले, “क्या जानना चाहते हों?”

लगभग दस बार सीढिया चढ़ने के बाद एक तरफ बनी एक विंडो के उमरे स्थान पर थोडा उकड़ होकर हम पास पास बैठ गए |

“में जानता हूँ, आप ‘देवी माँ’ के  बारे में कुछ जानना चाहते है !” शिव चाचा ने मेरी तरफ देखा|

“में आपके बारे में जानना चाहता हूँ |” मैंने अपनी ऊँगली उनकी तरफ दो तीन बार लहराई |

“मेरा नाम जगमोहन गुप्ता है |” वह गंभीर स्वर में बोले, ” गुप्ता फॅमिली का सदस्य हूँ ! हम लोग अत्यंत भाग्यशाली है भैया, जो पूज्य राधे शक्ति माँ हमारे घर में विराजमान है | देखिये जनाब | हमारा खानदानी धंदा है | बिसनेस, इनकम इज्जत शोहरत की कोई कमी पहले भी नहीं थी, लेकिन ‘देवी माँ’ के चरण जबसे हमारे घर पड़े है , हमारे तो जैसे भाग्य खुल से गए है !”

शिव चाचा एक क्षण के लिए रुके | खरवार तनिक गला साफ़ करने के बाद पुनः बोलना शुरू किया, “आज से साढ़े चार साल पहले मैंने ‘देवी माँ’ लीला का जो अनुभव किया, वो में आपको बताता हूँ | कुछ दिनों तक मेरी तबियत थोड़ी नरम रहते रहते अचानक मेरे पेट में भीतर ही भीतर ब्लीडिंग शुरू हो गयी | फ़ौरन डॉक्टर की तरफ भागे | इमर्जन्सी ट्रीटमेंट शुरू हो गया | बहुत प्रयत्नों के बाद भी ब्लीडिंग रुक नहीं रही थी | तबियत निरंतर डाउन होती जा रही थी हम लोगो ने एक क्षण के लिए भुला दिया थी की बड़े से बड़े डॉक्टरों का भी डॉक्टर तो हमारे घर में मौजूद है | ‘देवी माँ ने ‘ हमें कुछ समाया पहले बता दिया था की सतर्क रहे | परिवार के सदस्यों ने ‘देवी माँ’ के चरणों में विनती की | फ़ौरन प्रार्थना स्वीकार हुई | ‘देवी माँ’ के आशीर्वाद से मेरे भीतर की समस्त बीमारी निकल गयी | एकदम से में स्वस्थ होने लगा | मेरी आत्मा और शरीर के तमाम रोग नदारद हो गए | में कुछ ही दिनों में एकदम स्वस्थ हो गया| स्वस्थ ही नहीं हो गया, उम्र के लिहाज से पहले से बी ज्यादा तरोताजा और तंदुरुस्त फील करने लगा हूँ | ‘देवी माँ’ की दृष्टी मात्र से प्रत्येक रोग का निदान हो जाता है, यह मेरा विश्वास भी है और दावा भी| … बोले ‘राधे शक्ति माँ’ की ………”


“जय !” मैंने दोनों हाथ आसमान की तरफ तान दिए !

(निरंतर …………)  

Part 8

संजीव गुप्ता दो तिन कदम आगे बढ़ने के बाद रुके |     उन्होंने तनिक घूमकर मेरी तरफ अपना रुख किया |     उन्होंने दोनों हाथ क्षमा याचना की मुद्रा में जोड़े थे |    विशिष्ट मुस्कान के साथ उन्होंने मैत्री पूर्ण निगाहों से मेरी तरफ देखा |     उनके चेहरे के भावो से लग रहा था, जैसे वह कह रहे हो, मेरी बात का बुरा लगा तो माफ़ी मांगता हु |    

संजीव गुप्ता से मुझे विशेष आकर्षण और व्यक्तित्व नज़र आ रहा था |    उनके चेहरे से आत्मविश्वास और नेतृत्व के भाव जलक रहे थे |     किसी को भी अपनी और आकर्षित कर लेने की छबि ने मुझे उनका एक ही नजर में प्रशंशक बना दिया |     

मैं उनके निकट पंहुचा |   “सॉरी संजीवभाई” मैंने क्षमा भरे स्वर में कहा, ” दरअसल में यहाँ के वातावरण की एक एक बात से परिचित होना चाहता था, इसलिए अनिल से कुछ जानकारी हासिल करना छठा था…”

मेरी बात पुरिभी नहीं हुई थी की, मेरी बगल से एक महिला गुजरी |   उसे तिन चार व्यक्तियों ने घेर रखा था |   वह तेज कदमो से चलती हुई, सीधी सीढियों की तरफ बढाती चली जा रही थी | 

“ये रीना रॉय है” संजीव गुप्ता ने एकदम फुसफुसाते स्वर में कहा, “फिल्म स्टार ! पहचाना?”

ओह, हा! में जैसे कही खो गया था |   “ठीक कहा आपने” मैं सोच रहा था, इस महिला का चेहरा जाना पहचाना क्यों लग रहा है”

“सुनिए, भक्त जी”, संजीव गुप्ता अत्यंत व्यस्त स्वर में बोले, “देवी माँ के बारे में, यहाँ की ‘माता की चौकी’, यहाँ आनेवाले श्रद्धालु और देवी माँ के चमत्कारों के बारे में अगर आपको कुछ जानना है, तो कल समय निकालकर मेरे ऑफिस में आईये |  आपने चामुंडा सर्कल देखा है ?”

मैंने सहमती में सर हिलाया |  चामुंडा सर्कल में आप किसी से भी ‘ग्लोबल एडवरटाइजर्स’ की बिल्डिंग पूछिए |  संजीव गुप्ता गंभीर स्वर में बोए |  बड़ी सी कांच की बिल्डिंग है |  बाहर पूज्य राधे माँ का बड़ा सा होर्डिंग लगा है | ”

“जी|”, मैं कृतज्ञ स्वर में बोला |  “में समय निकालकर कल आता हु|”

“आपका नाम?” उन्होंने मेरी आँखों में झाका  | 

“भगत” में मुस्कुराया, “अभी तो नाम भगत है. दर्शनों के बाद देवी माँ का भगत हो जाऊंगा |”

“अच्छा लगा !” संजीव गुप्ता ने मेरा कन्धा थपथपाया |  “आप का यहाँ आना अच्छा लगा, आप कल आईये |  फिर में आपको देवी माँ के अनेकानेक चमत्कारों से अवगत करता हु | ”

“थेंक यू सर.” मैंने हाथ जोड़कर पूछा, “मेरा नंबर कब आएगा? ”

“जब आप पर देवी माँ की कृपा होगी |  ” संजीव गुप्ता श्रद्धा भरे स्वर में बोले, ” जब आपकी आस्था, आपका विश्वास, आपकी अंतर आत्मा सच्ची भावना से पुकारेगी, आप देवी माँ के सन्मुख खड़े होंगे |  ”

वो झटकसे मुड़े |  लम्बे उग भरते हुए सीढियों की तरफ बढे |  कुछ सेवादारो ने आदर से उन्हें नमस्ते किया |

“चलिए भगतजी..” एक सेवादार ने मुझे टोका|  “आगे बढ़ जाईये |  वह पिल्लर के पास खली जगह है | वहा बेठिये, प्लीज|”

में भीड़ में जगह बनाते हुए पिल्लर के पास पंहुचा| एक व्यक्ति ने तनिक खिसककर मेरे लिए जगह बनाई | सफ़ेद कुरता पायजमा और सफ़ेद पघडी बांधे, वह सिख संप्रदाय का युवक से लगने वाले आदमी ने एक उडती हुई दृष्टिमेरी तरफ डाली और फिर साजिंदों की तरफ देखने लगा, जो बड़े सधे हाथों से एकदम परफेक्ट ढंग से गायक की संगत्सर रहे थे|

मेरी दृष्टि उसपर जम गई|  सिख युवक ने मेरी तरफ मुह घुमाया| ” आप सुरेन्द्र है ना?”,  मैंने हर्षित स्वर में पूछा| “लाफ्टर चेलेंज, कोमेडी शो और बहुत से टीवी सीरियलों में मैंने आपको देखा है|”

उसने मुस्कुराकर सहमती में सर हिलाया|

“वह क्या बात है?” मैंने आपनी पीठ खुद थपथपाई, लकी हो भगत| इतने सारे सेलेब्रिटीज के एक साथ दर्शन हो गए |

“अभी तो देवी माँ के दर्शन बाकि है| मेरे मन के किसी कोने से आवाज आई| तब अपने आप को लकी कहना जाइज होगा |

“जय करा श्री राधे शक्ति माँ, मेरी गुडिया जैसी देवी माँ का..” मैंने अत्यंत बुलंद स्वर में उत्तर दिया, “बोल सच्चे दरबार की जय”

निरंतर……

निरंतर……

Part 7


पूज्य राधे माँ भवन के ग्राउंड फ्लोर स्थित  हॉल में माता की चौकी का कार्यक्रम हर्षौल्लास और पूर्ण भक्ति रस से भरा था  |  हॉल में ‘देवी माँ’ के श्रद्धालु की भीड़ निरंतर बढ़ रही थी  |  कई बार तो हॉल में मौजूद सेवादारो को व्यवस्था बनाये रखने में मुश्किल हो रही थी  |  मेरे ख्याल से जितनी श्रद्धालुओ  की संख्या यहाँ मौजूद थी, उससे कही ज्यादा हॉल के बहार कुर्सियों पर बैठे, लाइन में खड़े श्रद्धालु होल में भीतर आने को आतुर थे मगर शांत भाव से  | 

फिर एक पोस्टर हवा में लहेराते हुए, एक सेवादार श्रद्धालु में घूम गया  |  थोड़ी हलचल हुई  |  माता के दर्शनार्थियों अलग अलग जगहों से उठकर सीढियों की तरफ बढे  |  उनके द्वारा खाली की गई जगह फ़ौरन भर गई  |  मुख्य द्वार में श्रद्धालुओ ने भीतर प्रवेश करना प्रारंभ किया  |  में थोडा और दिवार में सट गया  |  सुप्रसिद्ध भजन गायक सार्दुल सिकंदर ने अपनी नयी रचना शुरू की, “मेरे भोले बाबा, राधे माँ का रूप क्या सजा दिया…..”.

दर्शनार्थियों ने जमते हुए तालियाँ बजाते हुए उनका साथ दिया  | 

सफ़ेद कुरता पायजामा पहेने सर पर गाँधी टोपी लगाये, एक तनिक भरी से उम्ब्रदराज सज्जन ने उठ कर, अपनी जेब से एक नोट निकला, सरदूल सिकंदर के सर के ऊपर एक-दो-तीन बार घामकर उन्होंने नोट निचे बैठे एक भक्त को थमा दिया  | 

सरदूल सिकंदर ने तनिक जुक कर उन सज्जन के पाँव छूने का उपक्रम किया  | 

“ये महाशय कौन है, अनिल?” मैंने कौतुहल स्वर में पूछा | 

“यह श्री मनमोहन गुप्ताजी (ताउजी)  है”  अनिल मंत्रमुग्ध स्वर में बोला, यह जितना भी कार्यक्रम यहाँ चल रहा है, यह सब गुप्ता परिवार की श्रद्धा और सेवाभावना है |  मनमोहनजी इस परिवार के मुखिया है |  आपने ऍम ऍम मीठाइवाले का नाम सुना है?

“किसने नहीं सुना, भाई?” मैंने सर हिलाया | ” मालाड स्टेशन के बहार उनकी मिष्टान भंडार पर तो अपार भीड़ लगी रहती है |  मैंने बहुतेरी बार ऍम ऍम के खास लस्सी का आनंद उठाया है |  ”

“उसी ऍम ऍम मिठाई की दूकान के मालिक है ये मनमोहन गुप्ता |  अनिल ने बात आगे बताई |  अपना सर्वस्व इस गुप्ता परिवार ने पूज्य देवी माँ को समर्पित कर दिया है |  जब से देवी माँ ने इनके निवास स्थान पर आसन लगाया है, गुप्ता परिवार तो धन्य हो गया |  इस परिवार में ४० सदस्य है |  छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा सदस्य देवी माँ के प्रति कृतज्ञ है |  देवी माँ जब भी किसी पर प्रस्सन होती है तो फिर ऐसा नजारा होता है, भगत जी |  हर पंद्रह दिन के बाद यहाँ माता की चौकी होती है |  हजारो की संख्या में देवी माँ के भक्त दर्शनों के लिए खिचे चले आते है |   जरा ऊपर देखो | 

मैंने गर्दन घुमाई | ” वो महिला जो हाथ में भोजन का थाल लिए है…..” अनिल तनिक मेरी तरफ जुका | ” वो श्रीमती स्नेहलता गुप्ता है”मनमोहन गुप्ताजी की धर्मपत्नी | 

एक दो पुरुष और महिला सेवादार फ़ौरन आगे पहुचे |  एक चुनरी का पर्दा बनाकर श्रीमती स्नेहलता गुप्ता ने माता को भोग लगाया | 

“अब भंडारा शुरू हो जायेगा”, अनिल ने हर्ष के स्वर में कहा, “ऊपर तीसरे माले पर बहुत विशाल टेरेस पर माता के प्रसाद की व्यवस्था है ! भगतजी, शादी ब्याह में जो खाना परोसा जाता है, उससे भी कही बढाकर उस भंडारे में हजारोकी संख्या में श्रद्धालु माता का प्रसाद प्राप्त करते है |  ”

“कोई पर्ची वर्ची कटनी पड़ती है क्या यहाँ?”, मैंने उत्सुक स्वर में पूछा |  “या कोई टोकन खरीदना पड़ता है?”

“आपका दिमाग ख़राब है क्या?” अनिल तनिक रूद्र स्वर में बोला |  ” भंडारे में कभी पैसा लिया जाता है क्या?” एकदम फ्री है जनाब ! चाहे जितने लोग आये, चाहे जितना खाए पेट भर के |  माता का प्रसाद है ये |  एक बात बताऊ?”

यह तनिक धीमे स्वर में बोला, “बहुत से लोग तो इसी लालच में घसे चले आते है की चलो, बढ़िया भोजन तो मिलेगा |  ”

“सत्संग की तरफ ध्यान दो” तभी एक सुन्दर सा युवक मेरे निकट से गुजरते हुए बोला “प्लीज़! बाते मत करो”

मैंने उसकी पीठ घूरते हुए अनिल से पूछा, “यह  बंदा कौन है, भैया? “…”इसका नाम …….” अनिल एकदम धीमे स्वर में बोला, ‘संजीव गुप्ता है” देवी माँ के चरणों का सेवादार |    

निरंतर………

Part 6

बोरीवली पश्चिम में रेलवे स्टेशन से अगर आप पैदल चले तो मुश्किल से १० मिनिट लगेंगे और आप पूज्य ‘राधे देवी माँ’ भवन पहुच जायेंगे. में वही पर उस समय ग्राउंड फ्लोर स्थित हॉल में बड़े धूम धाम से हो रही ‘माता की चौकी’ में उपस्थित था जहा सुप्रसिद्ध गायक सरदूल सिकंदर बड़ी तन्मयता से ‘मेरी गुडिया जैसी राधे माँ’ के भजन प्रस्तुत कर रहे थे |

एक सेवादार ने फिर एक पोस्टर पब्लिक में लेहराया जिस पर अगले दर्शनार्थियों के नंबर लिखे थे | थोड़ी हलचल हुई | जिन लोगो को पोस्टर में लिखे नंबर की पर्चियां मिली थी, बड़ी श्रद्धा और उल्हास मगर शांति के साथ सीढियों की तरफ बढ़ने लगे|  

तभी दर्शन करके लौट रहे एक सज्जन को देखकर मैंने अपनी कोहनी अनिल से हटाकर पूछा, वो लम्बा सा आदमी मुझे जाना पहेचाना सा लग रहा है|

“कौनसा?” अनिल ने उस” तरफ देखा, जिधर मेरी दृष्टी थी. “वो …. वो यहाँ के बहुत बड़े डॉक्टर है | देवी माँ के अनन्य सेवक है |”

“किसकी बात कर रहे हो?” मैंने अनिश्चित स्वर में कहा, “वो चश्मेवाले?” वो नहीं प्रभुजी, वो लम्बी चोटी वाले… जो दरबार की तरफ जा रहे है|

“अच्छा वो?” अनिल ने भावो को नचाया, “उसको नहीं पहेचाना?” वो अरविंदर है|” अरविंदर सिह| सूफी गायक, उनकी बहुत से एल्बम निकले है| आपने उनको जरूर टीवी पे देखा होगा|

“हा.. हा …हा… !” मैंने सहमती में तिन बार सर हिलाया. “याद आया, बहुत बार देखा है टीवी पर” यहाँ तो बहुत बहुत पहोची हुई हस्तियाँ देवी माँ के दर्शनों के लिए आते है| क्या बात है|

“चमत्कार को नमस्कार है, भाईजी” अनिल श्रद्धा और विश्वास भरे स्वर में बोला| आज सायंस और मीडिया का जमाना है| पढ़े लिखे समजदार लोग है| कुछ देखते है, तभी तो यहाँ आते है| कुछ मिलता है तभी तो यहाँ आते है| हर पन्द्रह रोज बाद यहाँ होनेवाली ‘माता की चौकी’ में हजारो भक्तो की भीड़ और वह भी ऐसे भक्तो की भीड़ जो एक बार ‘देवी माँ’ के दर्शन हो जाने के बाद भी बार-बार अनेक बार उनके दर्शनों की चाह रखते है| यह देवी माँ का चमत्कार है|

तभी प्रवेश द्वार में एक पंद्रह साल की लड़की ने भीतर प्रवेश किया| उसके हाथ में गुलाब का फूल था| उसके चहेरे पर उत्सुकता के भाव थे| आगे रास्ता नहीं होने के कारण वह मेरी बगल में खड़ी हो गई|

“तुम्हारा क्या नाम है, बिटिया? मैंने सहज स्वर में पूछा| “वैशाली” वह एकदम बाल सहज स्वर में बोली| “वैशाली मोरे” महाराष्ट्रियन हु| आप भी देवी माँ के दर्शनों के लिए आये है? मैंने तनिक रुक कर पूछा. “पहेले कितनी बार दर्शन हुए?”

एक बार भी नहीं| . उसने इंकार में सिर हिलाया| में तो फर्स्ट टाइम आई हु| वो भी माँ की कृपा हुई तो|

“वेरी गुड” क्या करती है बेटा? मैंने प्रशंशात्मक द्दृष्टी  से देखा |  “बी कॉम  फर्स्ट इयर के फॉर्म भरे है |”  वो मेरी तरफ देखकर बोली, “अंकल, मेरे साथ जो चमत्कार हुआ है, उस पर मुझे खुद्कोभी यकीं नहीं हो रहा |  बताऊ  क्या हुआ | ”

“बताओ” मैंने व्यग्र स्वर में पुछा |  ” में कल …. उसने कल स्वर पर जोर दिया. बांद्रा वेस्ट गई थी, एडमिशन के लिए |  यहाँ से ट्रेन पकड़ी, बांद्रा उतरी और दो अन्य लड़कियों के साथ शेयर रिक्शा लिया |  कॉलेज के सामने उतरकर में जल्दी जल्दी लाइन में लगने की हडबडाहट में अपना फ़ोन रिक्शा में भूल गई | अंकल, हम साधारण परिवार के लोग है | मैंने बड़ी कंजूसी करके, कई जगह छोटी मोटी सर्विस करके जैसे तैसे पैसे जमा करने बाद, अपनी पसंद का मोबाइल ख़रीदा था | अभी दस दिन पहेले तो लिया था और वह रिक्शा में छुट गया | ”

वह गंभीर निगाहों से मेरी तरफ देख रही थी | उसने होठो पर जीभ फिराई और फिर बोली, अपना पसंद का मोबाइल गुम हो जाने के कारण में बड़ी निराश थी | मैं एकदम ख़राब मूड और टेंशन में वापिस घर लौट रही थी तभी मैंने बैनर पर राधे देवी माँ का फोटो देखा |  मैंने मन ही मन प्रार्थना की, हे देवी माँ मेरा मोबाइल वापिस मिल जाए तो मैं आपके दर्शनों के लिए आउंगी |

वह सास लेने के लिए रुकी और फिर श्रद्धा भरे स्वर में बोली, मुझे रात को नींद में भी मोबाइल के सपने आते रहे |  आज सुबह जब में बोरीवली स्टेशन पर पोह्ची  तो, अंकल वही रिक्शावाला, सोचो कहा बांद्रा और कहा बोरीवली! वही रिक्शावाला मिल गया |  मैंने जैसेही उसकी तरफ देखा, उसने मेरा मोबाइल मेरे हाथ में थमा दिया |  मैंने पूछा भी आपको कैसे मालूम यह मेरा मोबाइल है, तो वह मुस्कुराकर बोला की उसने मुझे उस मोबाइल पे बातें करते देखा था |  अंकल, मोबाइल लौटने के बाद भाडा लेकर तुरंत रवाना हो गया |  मैं उसका अच्छी तरह से धन्यवाद् भी नहीं कर पाई | 

वैशाली मोरे ने अपने फूल वाले हाथ को तनिक ऊपर उठाया |  मैं देवी माँ का धन्यवाद् करने आई हूँ  | 

तभी हॉल में जोर का जयकारा गूंजा  |  बोल साचे दरबार की जय  | 


Part – 5

बारिश से भीगने से बचने के प्रयास में, मै न जाने किस डोर से बंधा  श्रधालुओ की कतार  में लगकर श्री राधे माँ भवन के ग्राउंड फ्लोअर स्थित हॉल में पहुँच गया | इस दौरान लाइन में मेरे आगे खड़े लुधिअना के ‘अर्जुन सचदेवा’ ने बताया की किस प्रकार श्री राधे शक्ति  माँ की दया  दृष्टि से उनके यहाँ ११ वर्ष के बात लड़का हुआ और वह ‘देवी माँ’ के प्रति कृत्यज्ञता प्रकट करने यहाँ आया था | उसके बाद मुझे हॉल में अनिल नाम का युवक मिला जो फगवाडा से आया था | उसीने मुझे दर्शनों के लिए पर्ची लाकर दी | हॉल में आगे बढ़ने को रास्ता नहीं होने के कारण हम प्रवेश द्वार के निकट दीवार से सट कर खड़े हो गए |

“अनिल! मैंने उसके कान के निकट अपना चेहरा किया, “तुम तो एकदम नौजवान हो ! इस उम्र में भक्ति – पूजा – पथ? क्या उम्र होगी तुम्हारी? यही कोई २५-२६ साल?”

“करेक्ट!” वह मुस्कुराया , ” ठीक जजमेंट ! इस  महिने  २५ पुरे करके 26 वे साल में प्रवेश करुन्ग्सा| इसी 15 जुलाई को मेरा जन्मदिन है ! और कितना भाग्यशाली हूँ मै ! मालूम है आपको 15 जुलाई को क्या है?”

“क्या है?” मैंने तनिक भवो को ऊपर किया|

“गुरु पोर्णिमा है!” वह एक एक शब्द पर जोर देते हुए बोला, “उस दिन श्री राधे माँ अपने सभी शिष्योंको विशेष दर्शन देने वाली है ! मै धन्य हो जाऊंगा जब देवी माँ के आशिर्वाद के साथ अपना जन्म दिन सेलिब्रेट करूँगा !”
उसका चेहरा ख़ुशी से दमक उठा|

“तुमने बताया नहीं ?”, मैंने अनिल को टोका, “तुम इस खाने पीने की उम्र में ये पूजा पथ भक्ति और सेवा में जुटे हो ! क्यों?”

“मत पूछो यार!”, वह तनिक गंभीर होकर सजिंदा स्वर में बोला, “दरअसल, मैंने चंडीगढ़ युनिवेर्सिटी से अपनी graduation पूरी की| इस दौरान गलत सांगत के कारण उलटे-सीधे कामो में पद गया | आवारागर्दी, जुआ-शराब, लढाई-झगडा, और न जाने क्या क्या ? घर से अनाप -शनाप पैसे आते थे जेब खर्च और पढाई के लिए| बुरी सोहबत  ने मुझे एक गैर जिम्मेदार और जिद्दी लड़का बना दिया | रोजाना की मारपीट और गलत हरकतों के कारण घर शिकायते पोछने लगी| पेरेंट्स ने फगवाडा वापिस  बुला लिया | वह में थोडेही सुधेरेने वाला था?, बुरी हरकतों के कारण मै पुरे फगवाडा में बदनाम हो गया था |”

मैंने सहानभूति भरी निगाहों से उसकी तरफ देखा |

“फिर एक बार फगवाडा में किसी भक्त के घर ‘देवी माँ’ का आगमन हुआ|”, वह शुन्य में ताकते हुए बोला, ” मेरे माँ-बाप जबरदस्ती से अपने साथ दर्शनों के लिए ले गए| इसी प्रकार भक्तों की भीड़ में हम कतार बध ‘देवी माँ’ के सामने पहुंचे| मेरी माँ आखों में आसू लिए बहुत देर तक मान ही मान न जाने क्या प्रार्थना कर रही थी | कापते होठों से न जाने क्या बुदबुदाते हुए वह निरंतर हाथ जोड़े जा रही थी| हम देवी माँ के संमुझ पहुंगे| देवी माँ ने पहले मेरे पिता की तरफ देखा उनके चेहरे पर छाये निराशा के भावों को पढ़ा | फिर मेरी माँ के झरते आसुंओं को निहारा| तब देवी माँ ने एक नज़र मुझ पर डाली | मेरे अंतर की आत्मा को जैसे किसी ने झकझोर कर रख दिया…..में एकदम उनके क़दमों में गिर गया|
मेरे मुह से बोल नहीं फुट रहे थे, मगर मेरे चेहरे पर पश्चाताप और क्षमायाचना के भाव उम्र आये थे | ‘देवी माँ’ ने अपना त्रिशूल वाला हाथ तनिक उठाया और आशिर्वाद की मुद्रा में मुस्कुराई |”

वह सांस लेने के लिए रुका|

“बस…” अनिल गंभी स्वर में बोला, “वह दिन और आज……………! उसी दिन से मेरी सभी गलत हरकतों से पिंड छुट गया | नशा – पत्ता बंद! शराब – सिगरेट आदि से ऐसी घृणा हुई की अब तो कोई मेरे सामने बीडी -सिगरेट पीता है, तोह में उससे मरने – मारने पे उतर हो जाता हूँ | मैंने गलत सोहबत वाले सभी दोस्तों को अलविदा कह दिया ! सुबह तडक उठकर नहा – धोकर, पूजा- पाठ के बाद ‘देवी माँ’ की दी हुई माला के साथ पाठ करने के बाद, पिताजी से भी पहले अपने कपडे  की शोरूम में पोहोचने लगा| मेरी माँ तो जैसे निहाल हो गयी | मेरे पिता का सीना गर्व से फुल जाता है, जब कोई उनके सामने मेरी तारीफों के पूल बंधता है | ”

“वह अनिल!” मैंने प्रशंसात्मक स्वर में कहा, “‘देवी माँ ने तोह तुम्हारा कायाकल्प कर दिया!”

उसने हाथ जोड़कर छत की तरफ देखा,” ‘देवी माँ’ है ही ऐसे !”

(निरंतर…)


Part – 4






श्री राधे माँ भवन के ग्राउंड फ्लोअर स्थित बड़े से हॉल में माता की चौकी के उस कार्यक्रम में श्रधालुओ की उस भीड़ में मुझे अलग अलग स्थानों से आये श्रधालुओ के चेहरे नज़र आ रहे थे | मैंने चारो तरफ निगाह दौड़ाने के बाद साथ बैठे सज्जन से धीमे स्वर में पुछा, “देवी माँ किधर बैठे है?”

‘वो तोह पाचवे मेल पर विराजमान है|” उसने गौर से मेरी तरफ देखा, ” आपको दर्शनों के लिए नंबर पर्ची मिली?”

“नहीं” मैंने इंकार में सिर हिलाया “मुझे कोई पर्ची -वरची मिली नहीं है|”

“कोई बात नहीं|” उसने आश्वस्त भाव से मेरे हाथ को थपथपाया “में ला देता हूँ|”

“में भी आपके साथ चलता हूँ|” मैंने उसे उठाते देखकर कहा, “कहासे मिलती है पर्ची?”

उसने इशारे से आने का संकेत दिया|

में उसके पीछे-पीछे हाल में प्रवेश करने वाले गेट तक पहुंचा | वह एक सेवादार के कम में कुछ कहने के बाद बहार गया और तुरंत लौट आया |

“ये लो……..” उसने एक पर्ची मेरे हाथ में थमाई,”आपका नंबर है 825 |”

“इसका क्या मतलब हुआ?” मैंने पहले पर्ची और फिर उसकी तरफ देखा |

“अभी समझाता हूँ|” वह हॉल में एक साइड में खड़े कुछ लोगो की तरफ देखने लगा | तभी एक सेवादार ने एक सूचना देने वाला पोस्टर पब्लिक की और दिखाया | उसपर लिखा था ‘551 to 600’

“देखो!” वह श्रद्धालु बोला,  अभी यह लोग जिनको  ‘551 to 600’ नंबर तक की पर्ची मिली है, वह श्रद्धालु सीढियों के रास्ते चढ़ते हुए पाचवे माला तक जायेंगे | वही पर देवी माँ के दर्शन होंगे |”

हॉल में बैठे कुछ श्रद्धालु पुरुष, महिलाये, बच्चे, नौजवान सीढियों की तरफ बड़े अनुशासनात्मक भाव से बढे |

“देखो, अभी ‘ 600  श्रधालुओं को दर्शन का बुलावा आया है |” मेरे साथ खड़े सज्जन बोले ” वोह क्या है ! जैसे पहले ५० दर्शनार्थी दर्शन करके निचे उतरेंगे, आगे की पर्ची वाले पचास लोगोंको ऊपर भेजा जायेगा | अभी कुछ समय बाद फिर पचास श्रधालुओं को दर्शन के लिए भेजा जायेगा | आपका नंबर क्या है ?”

“825” मैंने पर्ची में देख कर कहा |

“समझो आधा पौन घंटा और लगेगा |”  वह मुस्कुराया,  “तब तक आप भजनों का आनंद लो |”

“आपका नाम क्या है भगतजी?” मैंने उसकी तरफ देखते हुए धीरे से पुछा|

“अनिल”, वह हौले से मुस्कुराया, ” में फगवाडा का रहने वाला हूँ ”

“फगवाडा?” मैंने जिज्ञासु भाव से पुछा, “यह कहा है?”

“फगवाडा पंजाब में है |”, अनिल ने बताया, “लुधियाना का नाम सुना है?”

“हाँ” मैंने सहमती में सिर हिलाया |

“बस लुधिअना के पास ही है|” अनिल ने सिर हिलाया, “में यहाँ देवी माँ की सेवा की लिए आया हूँ| मुझे बड़ी प्रतीक्षा करनी पड़ी, बहुत हजारी लगनी पड़ी | तब जाकर सेवा का आदेश हुआ |”

“क्या सेवा करते हो?” मैंने सहज भाव से पुछा |

“जो मिल जाये ……” वह आत्मविभोर स्वर में बोला, “यह भवन में जो भी सेवा मिलती, में उसे अपना सौभाग्य मनाता हूँ |”

“जैसे?” मैंने प्रश्न किया|

“जैसे… ” वह तनिक सोच कर बोला, “जैसे कुछ भी | अभी जब सभी श्रद्धालु दर्शने करने के बाद चले जायेंगे तोह पांचवे माला तक सीढियों की सफाई, ऊपर हॉल में सफाई करना, यहाँ हाल के दरी गद्दे उठाना, हॉल में एक-दम साफ़ सफाई करना वैगेरह वैगेरह …….!”

“तुम तो बहोत ही किस्मत वाले हो अनिल ” मैंने मुग्ध निगाहों से उसे देखा, ” मुझे भी ऐसी कोई सेवा मिल जाएगी क्या?”

“अभी से?” अनिल ने हैरानी के साथ कहा, पता है?” में पिछले ३ साल से यहाँ लगातार हर दुसरे तीसरे शनिवार
को आ रहा हूँ | लगातार आरजी लगाने के बाद ‘देवी माँ ‘ ने मुझ पर यह मेहेरबानी की है | मेरा फगवाडा मैंने बहोत बड़ा कपड़ो का शो-रूम है | में पिछले १६ दिनों से यही ‘देवी माँ ‘की सेवा में हूँ |

“वापिस कब आयोगे? ” मैंने कौतुहल से पुछा |

अनिल श्रद्धाभाव  से बोला , ” जब ‘देवी माँ’  का हुकुम होगा !”

(निरंतर …)


Part – 3



कतार में लगे श्रधालुओं में से एक ने बुलंद स्वर में  जयकारा लगाया “जयकारा मेरी सच्ची सरकार श्री राधे शक्ती माँजी का ….”

“बोल सांचे दरबार की जय…” उत्तर में पूरी कतार ने दोनों हाथ उठाकर जयकारा पूरा किया |


तभी बूंदा बांदी ने तेज बोछार के साथ बरसात का रूप ले लिया | कतार जो धीमे धीमे आगे सरक रही थी, एकदम से तेज रफ़्तार में आगे बढ़ने लगी | एक गहिरे नीले सफारी सूट पहने सेवादार ने मुझे लाल रंग का रुमाल दिया | रुमाल पर अलग अलग तरह से “श्री राधे माँ” का नाम प्रिंट किया हुआ था | मैंने रुमाल को सर पर बांधने की कोशिश की | मेरे पिच्छे वाले सज्जन ने मदत करते हुए रुमाल को सही तरीके से बाँध दिया |


मैंने अपने आगे वाले पंजाब से ए अर्जुन सचदेवा की कहानी को गौर से सुना | उस आदमीं के स्वर में जो विश्वास, जो आशा, जो श्रध्हा, जो पूर्ण समर्पण की भावना चालक रही थी, में बिना दर्शन किये ही श्री राधे शक्ती माँ को अपने आस पास महसूस करने लगा |


अर्जुन सचदेवा ने बता की शादी के लगभग 11 साल बाद उसे पुत्र की प्राप्ति हुई और यह सब ‘देवी माँ’ की असीम अनुकम्पा और आशीर्वाद से ही संभव हुआ | अर्जुन सचदेवा अकेला ही देवी माँ का धन्यवाद् करने आया था |उसकी दादी की तबियत थोड़ी नरम थी, इसलिए अपनी पत्नी को उनकी सेवा के लिए छोड़कर आया था |


में कतार के साथ जैसे ही ग्राउंड फ्लोर पर स्थित बड़े से हॉल में पहुंचा, मेरे सामने अद्भुत नजारा था |
हॉल माता के भक्तों से खचाखच भरा था | अनेक सेवादार और सेवादारिया बड़े विनम्र और श्रद्धाभाव से भक्तो को अनुशानात्मक तरीके से बिठा रहे थे |


सामने भगवती माँ की चौकी का कार्यक्रम चल रहा था | सुन्दर दरबार सजा था | साजिन्दे बड़े कलात्मक ढंग से अपने अपने इंस्ट्रूमेंट बजा रहे थे | में जैसे ही दरबार के निकट पहुंचा, मैंने गौर से भजन गा रहे कलाकार की तरफ देखा |
बड़े ही मधुर और निपुण अधेस्वरों में बह गा रहा था | “मेरे भोले  बाबा, राधे माँ का रूप क्या सजा दिया ……”
एक सज्जन ने थोडा सरक कर मेरे लिए बैठने की जगह बनाई | मेंने कृतज्ञता पूर्वक उसकी तरफ मुस्कुराकर बैठते हुए हाल में नज़र दौड़ाई|


श्रधालुओं में ठसाठस भरे हॉल में सभी को बड़े व्यवस्थित ढंग से बैठाया गया था | अलग अलग जगहों से आये सभी श्रद्धालु भक्ति भाव तालिया बजाते, झूमते हुए भजन में लीन थे |


“बहुत बढ़िया गा रहे है भाई !” मैंने प्रशंसामत स्वर में बाजू में बैठे व्यक्ति से पुछा, ” इन भाईसाहब का नाम क्या है?”
“आप नहीं जानते ?” उस व्यक्ति ने अत्यंत गर्व भरे स्वर में कहा, ” ये पंजाब से आये है | हिंदुस्तान ही नहीं पुरे विश्व में इनकी गायकी की तारीफ होती है | ये ‘सरदूल सिकंदर’ है|”


में आश्चर्य चकित रह गया|


एक मुसलमान गायक ‘श्री राधे शक्ति माँ’ का गुणगान कर रहा था और वोह भी अत्यंत भक्ति भाव से !


धन्य श्री राधे शक्ति माँ !!

(निरंतर…)

Part 2

‘मेरा नाम अर्जुन सचदेवा है… मेरे आगे खड़ा व्यक्ति थोड़ी गर्दन मेरी तरफ घुमा कर बोला ‘ में लुधिअना का रहनेवाला हूँ | हमारा सायकलों के पार्ट्स बनाने का कारखाना है | यह हमारा पुश्तेनी बिज़नस है | देवी माँ का दिया सब कुछ है | सच पूछो तो  कोई कमी नहीं थी…”
लाइन धीरे धीरे आगे सरक रही थी | उसने तनिक रुकने के बाद बोलना शुरू किया, ” शानदार बंगला, बड़ा सा कारखाना, ढेरो वर्कर्स, घर में नौकर – चाकर ! एकदम खुशहाल परिवार | मेरे माता पिता और मेरी दादी ….  अभीतक जिंदा है | ….उसकी उम्र बताओ तो  आपको हैरानी होंगे …. 92 साल …..अभी भी जिंदा है |” 
” घर में धन -दौलत, मोटर गाड़ी, सुख आराम की कोई कमी नहीं ….” अर्जुन सचदेवा गंभीर स्वर में बोले, ” बस एक ही कमी खटकती थी .. मेरी शादी को 11 साल हो गए थे मगर …कोई औलाद नहीं थी | पहले 2 -3 साल तो  हसी ख़ुशी गुजर गए | उसके बाद हमारे घर में…. रिश्तेदारों में खुसुर – फुसुर शुरू हो गई | मेरी दादी की हर घडी एक ही रट रहती, ‘पोता चाहिए | पोते को गोद में खिलाना है | मेरी श्वासों का क्या भरोसा ! अर्जुन पुतर.. पोता चाहिए ! “
उसने जेब से रुमाल निकालकर अपने सर पर विशिष्ठ तरीके से बांधा |
“फिर क्या हुआ ??” मैंने उत्कंठा भरे स्वर में पुछा|
मेरी पत्नी माधुरी ने अनेक डॉक्टरों, वैद्यों से राय-मशवरा किया ! दवाओं से लेकर दुआओं का दौर शुरू हो गया | जिसने जो बोला वही करते ?… पीरों की दरगाहों पर मन्नते मांगी | मंदिरों में नारियल चढ़ाये | धागे बांधे |  यहाँ से वहां पता नहीं कहाँ कहाँ के धक्के खाये | अब तो हम दोनों भी निराश होने लगे | घर में अजीब सी चिंता ने आकर डेरा दाल लिया | दादी की ‘पोता चाहिए’ रट अब धीमी पड़ने लगी | उसके चेहरे पर निराशा और उदासी की ज़ुरियां और भी गहरी हो उठी |”
‘भगत जी … ” एक और सेवादार पार्थना भरे स्वर में टोका ..”थोडा जल्दी चलिए और हाँ अपना सर ढक लीजिये |”
मैंने आगे पीछे देखा | सभीके  सिरों पे रुमाल बंधे थे |
“लेकिन ,,,, ” मैंने अपनी जेबें टटोलते कहाँ “मेरे पास तोह सर ढकने का रुमाल नहीं नहीं |”
“थोडा आगे चलिए ” सेवादार ने मेरा कन्धा थपथपाया, ” आगे एक जगह रुमाल रखे है | वहां से लेकर सर पे बांध लेना|”
“जब हम एकदम निराशा के समुन्दर में गोते लगा रहे थे, ” अर्जुन सचदेवा ने आगे कहा, “तभी किसीने हमें सुझाव दिया की आप एक बार पूज्य श्री राधे शक्ती माँ की शरण में जाकर तो देखिये | उसने हमें यहाँ का एड्रेस दिया | पहले तो मैंने लापरवाही से टाल दिया | मगर मेरी पत्नी माधुरी  ने कहा, एक बार ही जाने  में क्या हर्ज़ है | हम दोनों यहाँ आये | पहली बार जब हमने श्री राधे शक्ती माँ के दर्शन किये तो हम दोनों के दिलों में आशा की किरण जैसे फुट पड़ी | हम निरंतर आते रहे | ‘देवी माँ’ के चरणों में माथा टिकाते रहे | फिर्याद करते रहे !… और फिर जैसे चमत्कार हो गया | ‘देवी माँ’ ने हमारे बहते आसुओं पर तरस खाया| “
“जैसे हमारे सोये भाग्य जाग उठे | ‘देवी माँ’ की कृपा जैसे अमृत बनकर हम पर बरसने लगी |”
“फिर क्या हुआ?” .. मैंने उतावले स्वर में पुछा… 
“फिर वही  हुआ जो देवी माँ की कृपा से होता है “.. अर्जुन सचदेवा चेह्कते स्वर में बोला….’दादी को पोता मिल गया”…

(निरन्तर….. ) 
Part 1

एक शनिवार /

उस समय रात्रि एक लगभग ९.३० बजे थे / में रात्रि का भोजन करने के बाद यूँही टहलने के लिए निचे उतर आया और धीमे धीमे कदमो से चलता हुआ सोडावाला लेन की तरफ निकल आया / बोरीवली पश्चिम में चंद्रावरकर रोड पर स्थित सोडावाला लेन मेरी पसंदीदा गली है/ जहाँ में अक्सर टहलने के लिए निकल आया करता हूँ /


अचानक हलकी हलकी बूंदा बांदी होने लगी /

मैंने भीगने से पहले बचेने के लिए जगह तलाश करते हुए इधर उधर झाका / तभी मुझे एक बिल्डिंग के सामने कुछ लोगो का हुजूम दिखाई दिया / मैंने तनिक कदम तेज किये मगर मुझे आश्चर्य हुआ / वहां लगी कतार में कोई भी सज्जन बारिश से बचने के लिए चिंतित दिखाई नहीं दे रहा था/ कतार में लगे बच्चे , बूढ़े, जवान, बुजुर्ग, महिलाये, लडकिया, बढे आराम से धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे /

यह लाइन कैसी है ? इस वक़्त इन लोगो को कतार बद्ध होकर कहाँ जाता है ? मेरा जिज्ञासु मान उत्सुकता से भर उठा / में कतार के निकट पहुंचा / एक सज्जन ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर मुझसे कहा ‘भगत जी ! कृपया लाइन में आईये /

में जब तक कुछ समझ पाता मेरे पीछे दस-बारह सज्जन कतार में लग चुके थे / कुछ लोगो के हाथों में फुल के गुलदस्ते, कईओंके हाथ में नारियल चुनरी और अन्य पूजा अदि का सामान था / शायद प्रशाद वैगेरह/

मैंने उत्सुकता से अपने आगे खड़े लगभग चालीस वर्षीय व्यक्ति से पुछा ”भाई, हम लोग कहा जा रहे है?”
उसने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुई सवाल किया, “पहली बार आये हो क्या? “

मैंने सहमती में गर्दन हिलाई!

“आज शनिवार है/” , वह भावविभोर स्वर में बोला, “आज भाग खुल जायेंगे / देवी माँ के दर्शन होंगे/”
“देवी माँ?” मैंने उत्सुकता से पुछा “यहाँ कोई मंदिर है?”

“मंदिर से भी बढ़कर …… ” वह एकदम श्रद्धा भरे स्वर में बोला, “यह राधे माँ भवन है…. ” वह मंत्रमुग्ध निगाहों से भवन की पाचवी मंझिल की तरफ निहारने लगा, ” देखो भगतजी …. जगतजगनी माँ भगवती एक है, मगर उसके करोडो करोडो उपासक है / अब जब सभी लोग माँ को पुकारेंगे तो माँ का एक साथ सभी के पास पहुचना तो संभव नहीं होगा ना / तब साक्षात् माँ अपने स्वरुप को किसी दूत के माध्यम से सबके पास पहुचती है / ऐसी ही माँ भगवती की दूत हमारी देवी माँ है / सभी उनको राधे शक्ति माँ के नाम से पुकारते है /

“आप कहाँ से पधारे है, भैया?” मैंने प्रश्न किया ?

“में..?”उसने मेरी तरफ देख कर कहा, “लुधिआना, पंजाब से ! और क्यों आया हूँ सुनोगे?”

“सुनाओ, !” मैंने सर हिलाया / वह गंभीर स्वर में बोला, “सुनो ….”


‘Shri Radhe Maa’ ki leelaye

‘Radhe Shakti Maa ki leelaye’ -‘ममतामयी श्री राधे शक्ति माँ की लीलाए’





परम श्रधेय श्री राधे शक्ति माँ को हाज़िर नाजिर मान कर कहता हूँ की जो कहूँगा सच कहूँगा, सच के सिवा कुछ न कहूँगा / – सरल कवी


Part  – 1

एक शनिवार /

उस समय रात्रि एक लगभग ९.३० बजे थे / में रात्रि का भोजन करने के बाद यूँही टहलने के लिए निचे उतर आया और धीमे धीमे कदमो से चलता हुआ सोडावाला लेन की तरफ निकल आया / बोरीवली पश्चिम में चंद्रावरकर रोड पर स्थित सोडावाला लेन मेरी पसंदीदा गली है/ जहाँ में अक्सर टहलने के लिए निकल आया करता हूँ /


अचानक हलकी हलकी बूंदा बांदी होने लगी /

मैंने भीगने से पहले बचेने के लिए जगह तलाश करते हुए इधर उधर झाका / तभी मुझे एक बिल्डिंग के सामने कुछ लोगो का हुजूम दिखाई दिया / मैंने तनिक कदम तेज किये मगर मुझे आश्चर्य हुआ / वहां लगी कतार में कोई भी सज्जन बारिश से बचने के लिए चिंतित दिखाई नहीं दे रहा था/ कतार में लगे बच्चे , बूढ़े, जवान, बुजुर्ग, महिलाये, लडकिया, बढे आराम से धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे /

यह लाइन कैसी है ? इस वक़्त इन लोगो को कतार बद्ध होकर कहाँ जाता है ? मेरा जिज्ञासु मान उत्सुकता से भर उठा / में कतार के निकट पहुंचा / एक सज्जन ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर मुझसे कहा ‘भगत जी ! कृपया लाइन में आईये /

में जब तक कुछ समझ पाता मेरे पीछे दस-बारह सज्जन कतार में लग चुके थे / कुछ लोगो के हाथों में फुल के गुलदस्ते, कईओंके हाथ में नारियल चुनरी और अन्य पूजा अदि का सामान था / शायद प्रशाद वैगेरह/

मैंने उत्सुकता से अपने आगे खड़े लगभग चालीस वर्षीय व्यक्ति से पुछा ”भाई, हम लोग कहा जा रहे है?”
उसने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुई सवाल किया, “पहली बार आये हो क्या? “

मैंने सहमती में गर्दन हिलाई!

“आज शनिवार है/” , वह भावविभोर स्वर में बोला, “आज भाग खुल जायेंगे / देवी माँ के दर्शन होंगे/”
“देवी माँ?” मैंने उत्सुकता से पुछा “यहाँ कोई मंदिर है?”

“मंदिर से भी बढ़कर …… ” वह एकदम श्रद्धा भरे स्वर में बोला, “यह राधे माँ भवन है…. ” वह मंत्रमुग्ध निगाहों से भवन की पाचवी मंझिल की तरफ निहारने लगा, ” देखो भगतजी …. जगतजगनी माँ भगवती एक है, मगर उसके करोडो करोडो उपासक है / अब जब सभी लोग माँ को पुकारेंगे तो माँ का एक साथ सभी के पास पहुचना तो संभव नहीं होगा ना / तब साक्षात् माँ अपने स्वरुप को किसी दूत के माध्यम से सबके पास पहुचती है / ऐसी ही माँ भगवती की दूत हमारी देवी माँ है / सभी उनको राधे शक्ति माँ के नाम से पुकारते है /

“आप कहाँ से पधारे है, भैया?” मैंने प्रश्न किया ?

“में..?”उसने मेरी तरफ देख कर कहा, “लुधिआना, पंजाब से ! और क्यों आया हूँ सुनोगे?”

“सुनाओ, !” मैंने सर हिलाया / वह गंभीर स्वर में बोला, “सुनो ….”

Part 2

‘मेरा नाम अर्जुन सचदेवा है… मेरे आगे खड़ा व्यक्ति थोड़ी गर्दन मेरी तरफ घुमा कर बोला ‘ में लुधिअना का रहनेवाला हूँ | हमारा सायकलों के पार्ट्स बनाने का कारखाना है | यह हमारा पुश्तेनी बिज़नस है | देवी माँ का दिया सब कुछ है | सच पूछो तो  कोई कमी नहीं थी…”
लाइन धीरे धीरे आगे सरक रही थी | उसने तनिक रुकने के बाद बोलना शुरू किया, ” शानदार बंगला, बड़ा सा कारखाना, ढेरो वर्कर्स, घर में नौकर – चाकर ! एकदम खुशहाल परिवार | मेरे माता पिता और मेरी दादी ….  अभीतक जिंदा है | ….उसकी उम्र बताओ तो  आपको हैरानी होंगे …. 92 साल …..अभी भी जिंदा है |” 
” घर में धन -दौलत, मोटर गाड़ी, सुख आराम की कोई कमी नहीं ….” अर्जुन सचदेवा गंभीर स्वर में बोले, ” बस एक ही कमी खटकती थी .. मेरी शादी को 11 साल हो गए थे मगर …कोई औलाद नहीं थी | पहले 2 -3 साल तो  हसी ख़ुशी गुजर गए | उसके बाद हमारे घर में…. रिश्तेदारों में खुसुर – फुसुर शुरू हो गई | मेरी दादी की हर घडी एक ही रट रहती, ‘पोता चाहिए | पोते को गोद में खिलाना है | मेरी श्वासों का क्या भरोसा ! अर्जुन पुतर.. पोता चाहिए ! “
उसने जेब से रुमाल निकालकर अपने सर पर विशिष्ठ तरीके से बांधा |
“फिर क्या हुआ ??” मैंने उत्कंठा भरे स्वर में पुछा|
मेरी पत्नी माधुरी ने अनेक डॉक्टरों, वैद्यों से राय-मशवरा किया ! दवाओं से लेकर दुआओं का दौर शुरू हो गया | जिसने जो बोला वही करते ?… पीरों की दरगाहों पर मन्नते मांगी | मंदिरों में नारियल चढ़ाये | धागे बांधे |  यहाँ से वहां पता नहीं कहाँ कहाँ के धक्के खाये | अब तो हम दोनों भी निराश होने लगे | घर में अजीब सी चिंता ने आकर डेरा दाल लिया | दादी की ‘पोता चाहिए’ रट अब धीमी पड़ने लगी | उसके चेहरे पर निराशा और उदासी की ज़ुरियां और भी गहरी हो उठी |”
‘भगत जी … ” एक और सेवादार पार्थना भरे स्वर में टोका ..”थोडा जल्दी चलिए और हाँ अपना सर ढक लीजिये |”
मैंने आगे पीछे देखा | सभीके  सिरों पे रुमाल बंधे थे |
“लेकिन ,,,, ” मैंने अपनी जेबें टटोलते कहाँ “मेरे पास तोह सर ढकने का रुमाल नहीं नहीं |”
“थोडा आगे चलिए ” सेवादार ने मेरा कन्धा थपथपाया, ” आगे एक जगह रुमाल रखे है | वहां से लेकर सर पे बांध लेना|”
“जब हम एकदम निराशा के समुन्दर में गोते लगा रहे थे, ” अर्जुन सचदेवा ने आगे कहा, “तभी किसीने हमें सुझाव दिया की आप एक बार पूज्य श्री राधे शक्ती माँ की शरण में जाकर तो देखिये | उसने हमें यहाँ का एड्रेस दिया | पहले तो मैंने लापरवाही से टाल दिया | मगर मेरी पत्नी माधुरी  ने कहा, एक बार ही जाने  में क्या हर्ज़ है | हम दोनों यहाँ आये | पहली बार जब हमने श्री राधे शक्ती माँ के दर्शन किये तो हम दोनों के दिलों में आशा की किरण जैसे फुट पड़ी | हम निरंतर आते रहे | ‘देवी माँ’ के चरणों में माथा टिकाते रहे | फिर्याद करते रहे !… और फिर जैसे चमत्कार हो गया | ‘देवी माँ’ ने हमारे बहते आसुओं पर तरस खाया| “
“जैसे हमारे सोये भाग्य जाग उठे | ‘देवी माँ’ की कृपा जैसे अमृत बनकर हम पर बरसने लगी |”
“फिर क्या हुआ?” .. मैंने उतावले स्वर में पुछा… 
“फिर वही  हुआ जो देवी माँ की कृपा से होता है “.. अर्जुन सचदेवा चेह्कते स्वर में बोला….’दादी को पोता मिल गया”…

(निरन्तर….. )

Part – 3



कतार में लगे श्रधालुओं में से एक ने बुलंद स्वर में  जयकारा लगाया “जयकारा मेरी सच्ची सरकार श्री राधे शक्ती माँजी का ….”

“बोल सांचे दरबार की जय…” उत्तर में पूरी कतार ने दोनों हाथ उठाकर जयकारा पूरा किया |


तभी बूंदा बांदी ने तेज बोछार के साथ बरसात का रूप ले लिया | कतार जो धीमे धीमे आगे सरक रही थी, एकदम से तेज रफ़्तार में आगे बढ़ने लगी | एक गहिरे नीले सफारी सूट पहने सेवादार ने मुझे लाल रंग का रुमाल दिया | रुमाल पर अलग अलग तरह से “श्री राधे माँ” का नाम प्रिंट किया हुआ था | मैंने रुमाल को सर पर बांधने की कोशिश की | मेरे पिच्छे वाले सज्जन ने मदत करते हुए रुमाल को सही तरीके से बाँध दिया |


मैंने अपने आगे वाले पंजाब से ए अर्जुन सचदेवा की कहानी को गौर से सुना | उस आदमीं के स्वर में जो विश्वास, जो आशा, जो श्रध्हा, जो पूर्ण समर्पण की भावना चालक रही थी, में बिना दर्शन किये ही श्री राधे शक्ती माँ को अपने आस पास महसूस करने लगा |


अर्जुन सचदेवा ने बता की शादी के लगभग 11 साल बाद उसे पुत्र की प्राप्ति हुई और यह सब ‘देवी माँ’ की असीम अनुकम्पा और आशीर्वाद से ही संभव हुआ | अर्जुन सचदेवा अकेला ही देवी माँ का धन्यवाद् करने आया था |उसकी दादी की तबियत थोड़ी नरम थी, इसलिए अपनी पत्नी को उनकी सेवा के लिए छोड़कर आया था |


में कतार के साथ जैसे ही ग्राउंड फ्लोर पर स्थित बड़े से हॉल में पहुंचा, मेरे सामने अद्भुत नजारा था |
हॉल माता के भक्तों से खचाखच भरा था | अनेक सेवादार और सेवादारिया बड़े विनम्र और श्रद्धाभाव से भक्तो को अनुशानात्मक तरीके से बिठा रहे थे |


सामने भगवती माँ की चौकी का कार्यक्रम चल रहा था | सुन्दर दरबार सजा था | साजिन्दे बड़े कलात्मक ढंग से अपने अपने इंस्ट्रूमेंट बजा रहे थे | में जैसे ही दरबार के निकट पहुंचा, मैंने गौर से भजन गा रहे कलाकार की तरफ देखा |
बड़े ही मधुर और निपुण अधेस्वरों में बह गा रहा था | “मेरे भोले  बाबा, राधे माँ का रूप क्या सजा दिया ……”
एक सज्जन ने थोडा सरक कर मेरे लिए बैठने की जगह बनाई | मेंने कृतज्ञता पूर्वक उसकी तरफ मुस्कुराकर बैठते हुए हाल में नज़र दौड़ाई|


श्रधालुओं में ठसाठस भरे हॉल में सभी को बड़े व्यवस्थित ढंग से बैठाया गया था | अलग अलग जगहों से आये सभी श्रद्धालु भक्ति भाव तालिया बजाते, झूमते हुए भजन में लीन थे |


“बहुत बढ़िया गा रहे है भाई !” मैंने प्रशंसामत स्वर में बाजू में बैठे व्यक्ति से पुछा, ” इन भाईसाहब का नाम क्या है?”
“आप नहीं जानते ?” उस व्यक्ति ने अत्यंत गर्व भरे स्वर में कहा, ” ये पंजाब से आये है | हिंदुस्तान ही नहीं पुरे विश्व में इनकी गायकी की तारीफ होती है | ये ‘सरदूल सिकंदर’ है|”


में आश्चर्य चकित रह गया|


एक मुसलमान गायक ‘श्री राधे शक्ति माँ’ का गुणगान कर रहा था और वोह भी अत्यंत भक्ति भाव से !


धन्य श्री राधे शक्ति माँ !!

(निरंतर…)




Part – 4







श्री राधे माँ भवन के ग्राउंड फ्लोअर स्थित बड़े से हॉल में माता की चौकी के उस कार्यक्रम में श्रधालुओ की उस भीड़ में मुझे अलग अलग स्थानों से आये श्रधालुओ के चेहरे नज़र आ रहे थे | मैंने चारो तरफ निगाह दौड़ाने के बाद साथ बैठे सज्जन से धीमे स्वर में पुछा, “देवी माँ किधर बैठे है?”

‘वो तोह पाचवे मेल पर विराजमान है|” उसने गौर से मेरी तरफ देखा, ” आपको दर्शनों के लिए नंबर पर्ची मिली?”

“नहीं” मैंने इंकार में सिर हिलाया “मुझे कोई पर्ची -वरची मिली नहीं है|”

“कोई बात नहीं|” उसने आश्वस्त भाव से मेरे हाथ को थपथपाया “में ला देता हूँ|”

“में भी आपके साथ चलता हूँ|” मैंने उसे उठाते देखकर कहा, “कहासे मिलती है पर्ची?”

उसने इशारे से आने का संकेत दिया|

में उसके पीछे-पीछे हाल में प्रवेश करने वाले गेट तक पहुंचा | वह एक सेवादार के कम में कुछ कहने के बाद बहार गया और तुरंत लौट आया |

“ये लो……..” उसने एक पर्ची मेरे हाथ में थमाई,”आपका नंबर है 825 |”

“इसका क्या मतलब हुआ?” मैंने पहले पर्ची और फिर उसकी तरफ देखा |

“अभी समझाता हूँ|” वह हॉल में एक साइड में खड़े कुछ लोगो की तरफ देखने लगा | तभी एक सेवादार ने एक सूचना देने वाला पोस्टर पब्लिक की और दिखाया | उसपर लिखा था ‘551 to 600’

“देखो!” वह श्रद्धालु बोला,  अभी यह लोग जिनको  ‘551 to 600’ नंबर तक की पर्ची मिली है, वह श्रद्धालु सीढियों के रास्ते चढ़ते हुए पाचवे माला तक जायेंगे | वही पर देवी माँ के दर्शन होंगे |”

हॉल में बैठे कुछ श्रद्धालु पुरुष, महिलाये, बच्चे, नौजवान सीढियों की तरफ बड़े अनुशासनात्मक भाव से बढे |

“देखो, अभी ‘ 600  श्रधालुओं को दर्शन का बुलावा आया है |” मेरे साथ खड़े सज्जन बोले ” वोह क्या है ! जैसे पहले ५० दर्शनार्थी दर्शन करके निचे उतरेंगे, आगे की पर्ची वाले पचास लोगोंको ऊपर भेजा जायेगा | अभी कुछ समय बाद फिर पचास श्रधालुओं को दर्शन के लिए भेजा जायेगा | आपका नंबर क्या है ?”

“825” मैंने पर्ची में देख कर कहा |

“समझो आधा पौन घंटा और लगेगा |”  वह मुस्कुराया,  “तब तक आप भजनों का आनंद लो |”

“आपका नाम क्या है भगतजी?” मैंने उसकी तरफ देखते हुए धीरे से पुछा|

“अनिल”, वह हौले से मुस्कुराया, ” में फगवाडा का रहने वाला हूँ ”

“फगवाडा?” मैंने जिज्ञासु भाव से पुछा, “यह कहा है?”

“फगवाडा पंजाब में है |”, अनिल ने बताया, “लुधियाना का नाम सुना है?”

“हाँ” मैंने सहमती में सिर हिलाया |

“बस लुधिअना के पास ही है|” अनिल ने सिर हिलाया, “में यहाँ देवी माँ की सेवा की लिए आया हूँ| मुझे बड़ी प्रतीक्षा करनी पड़ी, बहुत हजारी लगनी पड़ी | तब जाकर सेवा का आदेश हुआ |”

“क्या सेवा करते हो?” मैंने सहज भाव से पुछा |

“जो मिल जाये ……” वह आत्मविभोर स्वर में बोला, “यह भवन में जो भी सेवा मिलती, में उसे अपना सौभाग्य मनाता हूँ |”

“जैसे?” मैंने प्रश्न किया|

“जैसे… ” वह तनिक सोच कर बोला, “जैसे कुछ भी | अभी जब सभी श्रद्धालु दर्शने करने के बाद चले जायेंगे तोह पांचवे माला तक सीढियों की सफाई, ऊपर हॉल में सफाई करना, यहाँ हाल के दरी गद्दे उठाना, हॉल में एक-दम साफ़ सफाई करना वैगेरह वैगेरह …….!”

“तुम तो बहोत ही किस्मत वाले हो अनिल ” मैंने मुग्ध निगाहों से उसे देखा, ” मुझे भी ऐसी कोई सेवा मिल जाएगी क्या?”

“अभी से?” अनिल ने हैरानी के साथ कहा, पता है?” में पिछले ३ साल से यहाँ लगातार हर दुसरे तीसरे शनिवार
को आ रहा हूँ | लगातार आरजी लगाने के बाद ‘देवी माँ ‘ ने मुझ पर यह मेहेरबानी की है | मेरा फगवाडा मैंने बहोत बड़ा कपड़ो का शो-रूम है | में पिछले १६ दिनों से यही ‘देवी माँ ‘की सेवा में हूँ |

“वापिस कब आयोगे? ” मैंने कौतुहल से पुछा |

अनिल श्रद्धाभाव  से बोला , ” जब ‘देवी माँ’  का हुकुम होगा !”

(निरंतर …)

Part – 5

बारिश से भीगने से बचने के प्रयास में, मै न जाने किस डोर से बंधा  श्रधालुओ की कतार  में लगकर श्री राधे माँ भवन के ग्राउंड फ्लोअर स्थित हॉल में पहुँच गया | इस दौरान लाइन में मेरे आगे खड़े लुधिअना के ‘अर्जुन सचदेवा’ ने बताया की किस प्रकार श्री राधे शक्ति  माँ की दया  दृष्टि से उनके यहाँ ११ वर्ष के बात लड़का हुआ और वह ‘देवी माँ’ के प्रति कृत्यज्ञता प्रकट करने यहाँ आया था | उसके बाद मुझे हॉल में अनिल नाम का युवक मिला जो फगवाडा से आया था | उसीने मुझे दर्शनों के लिए पर्ची लाकर दी | हॉल में आगे बढ़ने को रास्ता नहीं होने के कारण हम प्रवेश द्वार के निकट दीवार से सट कर खड़े हो गए |

“अनिल! मैंने उसके कान के निकट अपना चेहरा किया, “तुम तो एकदम नौजवान हो ! इस उम्र में भक्ति – पूजा – पथ? क्या उम्र होगी तुम्हारी? यही कोई २५-२६ साल?”

“करेक्ट!” वह मुस्कुराया , ” ठीक जजमेंट ! इस  महिने  २५ पुरे करके 26 वे साल में प्रवेश करुन्ग्सा| इसी 15 जुलाई को मेरा जन्मदिन है ! और कितना भाग्यशाली हूँ मै ! मालूम है आपको 15 जुलाई को क्या है?”

“क्या है?” मैंने तनिक भवो को ऊपर किया|

“गुरु पोर्णिमा है!” वह एक एक शब्द पर जोर देते हुए बोला, “उस दिन श्री राधे माँ अपने सभी शिष्योंको विशेष दर्शन देने वाली है ! मै धन्य हो जाऊंगा जब देवी माँ के आशिर्वाद के साथ अपना जन्म दिन सेलिब्रेट करूँगा !”
उसका चेहरा ख़ुशी से दमक उठा|

“तुमने बताया नहीं ?”, मैंने अनिल को टोका, “तुम इस खाने पीने की उम्र में ये पूजा पथ भक्ति और सेवा में जुटे हो ! क्यों?”

“मत पूछो यार!”, वह तनिक गंभीर होकर सजिंदा स्वर में बोला, “दरअसल, मैंने चंडीगढ़ युनिवेर्सिटी से अपनी graduation पूरी की| इस दौरान गलत सांगत के कारण उलटे-सीधे कामो में पद गया | आवारागर्दी, जुआ-शराब, लढाई-झगडा, और न जाने क्या क्या ? घर से अनाप -शनाप पैसे आते थे जेब खर्च और पढाई के लिए| बुरी सोहबत  ने मुझे एक गैर जिम्मेदार और जिद्दी लड़का बना दिया | रोजाना की मारपीट और गलत हरकतों के कारण घर शिकायते पोछने लगी| पेरेंट्स ने फगवाडा वापिस  बुला लिया | वह में थोडेही सुधेरेने वाला था?, बुरी हरकतों के कारण मै पुरे फगवाडा में बदनाम हो गया था |”

मैंने सहानभूति भरी निगाहों से उसकी तरफ देखा |

“फिर एक बार फगवाडा में किसी भक्त के घर ‘देवी माँ’ का आगमन हुआ|”, वह शुन्य में ताकते हुए बोला, ” मेरे माँ-बाप जबरदस्ती से अपने साथ दर्शनों के लिए ले गए| इसी प्रकार भक्तों की भीड़ में हम कतार बध ‘देवी माँ’ के सामने पहुंचे| मेरी माँ आखों में आसू लिए बहुत देर तक मान ही मान न जाने क्या प्रार्थना कर रही थी | कापते होठों से न जाने क्या बुदबुदाते हुए वह निरंतर हाथ जोड़े जा रही थी| हम देवी माँ के संमुझ पहुंगे| देवी माँ ने पहले मेरे पिता की तरफ देखा उनके चेहरे पर छाये निराशा के भावों को पढ़ा | फिर मेरी माँ के झरते आसुंओं को निहारा| तब देवी माँ ने एक नज़र मुझ पर डाली | मेरे अंतर की आत्मा को जैसे किसी ने झकझोर कर रख दिया…..में एकदम उनके क़दमों में गिर गया|
मेरे मुह से बोल नहीं फुट रहे थे, मगर मेरे चेहरे पर पश्चाताप और क्षमायाचना के भाव उम्र आये थे | ‘देवी माँ’ ने अपना त्रिशूल वाला हाथ तनिक उठाया और आशिर्वाद की मुद्रा में मुस्कुराई |”

वह सांस लेने के लिए रुका|

“बस…” अनिल गंभी स्वर में बोला, “वह दिन और आज……………! उसी दिन से मेरी सभी गलत हरकतों से पिंड छुट गया | नशा – पत्ता बंद! शराब – सिगरेट आदि से ऐसी घृणा हुई की अब तो कोई मेरे सामने बीडी -सिगरेट पीता है, तोह में उससे मरने – मारने पे उतर हो जाता हूँ | मैंने गलत सोहबत वाले सभी दोस्तों को अलविदा कह दिया ! सुबह तडक उठकर नहा – धोकर, पूजा- पाठ के बाद ‘देवी माँ’ की दी हुई माला के साथ पाठ करने के बाद, पिताजी से भी पहले अपने कपडे  की शोरूम में पोहोचने लगा| मेरी माँ तो जैसे निहाल हो गयी | मेरे पिता का सीना गर्व से फुल जाता है, जब कोई उनके सामने मेरी तारीफों के पूल बंधता है | ”

“वह अनिल!” मैंने प्रशंसात्मक स्वर में कहा, “‘देवी माँ ने तोह तुम्हारा कायाकल्प कर दिया!”

उसने हाथ जोड़कर छत की तरफ देखा,” ‘देवी माँ’ है ही ऐसे !”

(निरंतर…)

Part 6

बोरीवली पश्चिम में रेलवे स्टेशन से अगर आप पैदल चले तो मुश्किल से १० मिनिट लगेंगे और आप पूज्य ‘राधे देवी माँ’ भवन पहुच जायेंगे. में वही पर उस समय ग्राउंड फ्लोर स्थित हॉल में बड़े धूम धाम से हो रही ‘माता की चौकी’ में उपस्थित था जहा सुप्रसिद्ध गायक सरदूल सिकंदर बड़ी तन्मयता से ‘मेरी गुडिया जैसी राधे माँ’ के भजन प्रस्तुत कर रहे थे |

एक सेवादार ने फिर एक पोस्टर पब्लिक में लेहराया जिस पर अगले दर्शनार्थियों के नंबर लिखे थे | थोड़ी हलचल हुई | जिन लोगो को पोस्टर में लिखे नंबर की पर्चियां मिली थी, बड़ी श्रद्धा और उल्हास मगर शांति के साथ सीढियों की तरफ बढ़ने लगे|

तभी दर्शन करके लौट रहे एक सज्जन को देखकर मैंने अपनी कोहनी अनिल से हटाकर पूछा, वो लम्बा सा आदमी मुझे जाना पहेचाना सा लग रहा है|

“कौनसा?” अनिल ने उस” तरफ देखा, जिधर मेरी दृष्टी थी. “वो …. वो यहाँ के बहुत बड़े डॉक्टर है | देवी माँ के अनन्य सेवक है |”

“किसकी बात कर रहे हो?” मैंने अनिश्चित स्वर में कहा, “वो चश्मेवाले?” वो नहीं प्रभुजी, वो लम्बी चोटी वाले… जो दरबार की तरफ जा रहे है|

“अच्छा वो?” अनिल ने भावो को नचाया, “उसको नहीं पहेचाना?” वो अरविंदर है|” अरविंदर सिह| सूफी गायक, उनकी बहुत से एल्बम निकले है| आपने उनको जरूर टीवी पे देखा होगा|

“हा.. हा …हा… !” मैंने सहमती में तिन बार सर हिलाया. “याद आया, बहुत बार देखा है टीवी पर” यहाँ तो बहुत बहुत पहोची हुई हस्तियाँ देवी माँ के दर्शनों के लिए आते है| क्या बात है|

“चमत्कार को नमस्कार है, भाईजी” अनिल श्रद्धा और विश्वास भरे स्वर में बोला| आज सायंस और मीडिया का जमाना है| पढ़े लिखे समजदार लोग है| कुछ देखते है, तभी तो यहाँ आते है| कुछ मिलता है तभी तो यहाँ आते है| हर पन्द्रह रोज बाद यहाँ होनेवाली ‘माता की चौकी’ में हजारो भक्तो की भीड़ और वह भी ऐसे भक्तो की भीड़ जो एक बार ‘देवी माँ’ के दर्शन हो जाने के बाद भी बार-बार अनेक बार उनके दर्शनों की चाह रखते है| यह देवी माँ का चमत्कार है|

तभी प्रवेश द्वार में एक पंद्रह साल की लड़की ने भीतर प्रवेश किया| उसके हाथ में गुलाब का फूल था| उसके चहेरे पर उत्सुकता के भाव थे| आगे रास्ता नहीं होने के कारण वह मेरी बगल में खड़ी हो गई|

“तुम्हारा क्या नाम है, बिटिया? मैंने सहज स्वर में पूछा| “वैशाली” वह एकदम बाल सहज स्वर में बोली| “वैशाली मोरे” महाराष्ट्रियन हु| आप भी देवी माँ के दर्शनों के लिए आये है? मैंने तनिक रुक कर पूछा. “पहेले कितनी बार दर्शन हुए?”

एक बार भी नहीं| . उसने इंकार में सिर हिलाया| में तो फर्स्ट टाइम आई हु| वो भी माँ की कृपा हुई तो|

“वेरी गुड” क्या करती है बेटा? मैंने प्रशंशात्मक द्दृष्टी  से देखा |  “बी कॉम  फर्स्ट इयर के फॉर्म भरे है |”  वो मेरी तरफ देखकर बोली, “अंकल, मेरे साथ जो चमत्कार हुआ है, उस पर मुझे खुद्कोभी यकीं नहीं हो रहा |  बताऊ  क्या हुआ | ”

“बताओ” मैंने व्यग्र स्वर में पुछा |  ” में कल …. उसने कल स्वर पर जोर दिया. बांद्रा वेस्ट गई थी, एडमिशन के लिए |  यहाँ से ट्रेन पकड़ी, बांद्रा उतरी और दो अन्य लड़कियों के साथ शेयर रिक्शा लिया |  कॉलेज के सामने उतरकर में जल्दी जल्दी लाइन में लगने की हडबडाहट में अपना फ़ोन रिक्शा में भूल गई | अंकल, हम साधारण परिवार के लोग है | मैंने बड़ी कंजूसी करके, कई जगह छोटी मोटी सर्विस करके जैसे तैसे पैसे जमा करने बाद, अपनी पसंद का मोबाइल ख़रीदा था | अभी दस दिन पहेले तो लिया था और वह रिक्शा में छुट गया | ”

वह गंभीर निगाहों से मेरी तरफ देख रही थी | उसने होठो पर जीभ फिराई और फिर बोली, अपना पसंद का मोबाइल गुम हो जाने के कारण में बड़ी निराश थी | मैं एकदम ख़राब मूड और टेंशन में वापिस घर लौट रही थी तभी मैंने बैनर पर राधे देवी माँ का फोटो देखा |  मैंने मन ही मन प्रार्थना की, हे देवी माँ मेरा मोबाइल वापिस मिल जाए तो मैं आपके दर्शनों के लिए आउंगी |

वह सास लेने के लिए रुकी और फिर श्रद्धा भरे स्वर में बोली, मुझे रात को नींद में भी मोबाइल के सपने आते रहे |  आज सुबह जब में बोरीवली स्टेशन पर पोह्ची  तो, अंकल वही रिक्शावाला, सोचो कहा बांद्रा और कहा बोरीवली! वही रिक्शावाला मिल गया |  मैंने जैसेही उसकी तरफ देखा, उसने मेरा मोबाइल मेरे हाथ में थमा दिया |  मैंने पूछा भी आपको कैसे मालूम यह मेरा मोबाइल है, तो वह मुस्कुराकर बोला की उसने मुझे उस मोबाइल पे बातें करते देखा था |  अंकल, मोबाइल लौटने के बाद भाडा लेकर तुरंत रवाना हो गया |  मैं उसका अच्छी तरह से धन्यवाद् भी नहीं कर पाई |

वैशाली मोरे ने अपने फूल वाले हाथ को तनिक ऊपर उठाया |  मैं देवी माँ का धन्यवाद् करने आई हूँ  |

तभी हॉल में जोर का जयकारा गूंजा  |  बोल साचे दरबार की जय  |

निरंतर……

Part 7

पूज्य राधे माँ भवन के ग्राउंड फ्लोर स्थित  हॉल में माता की चौकी का कार्यक्रम हर्षौल्लास और पूर्ण भक्ति रस से भरा था  |  हॉलमें ‘देवी माँ’ के श्रद्धालु की भीड़ निरंतर बढ़ रही थी  |  कई बार तो हॉल में मौजूद सेवादारो को व्यवस्था बनाये रखने में मुश्किल हो रही थी  |  मेरे ख्याल से जितनी श्रद्धालुओ  की संख्या यहाँ मौजूद थी, उससे कही ज्यादा हॉलके बहार कुर्सियों पर बैठे, लाइन में खड़े श्रद्धालु होल में भीतर आने को आतुर थे मगर शांत भाव से  |

फिर एक पोस्टर हवा में लहेराते हुए, एक सेवादार श्रद्धालु में घूम गया  |  थोड़ी हलचल हुई  |  माता के दर्शनार्थियों अलग अलग जगहों से उठकर सीढियों की तरफ बढे  |  उनके द्वारा खाली की गई जगह फ़ौरन भर गई  |  मुख्य द्वार में श्रद्धालुओ ने भीतर प्रवेश करना प्रारंभ किया  |  में थोडा और दिवार में सट गया  |  सुप्रसिद्ध भजन गायक सार्दुल सिकंदर ने अपनी नयी रचना शुरू की, “मेरे भोले बाबा, राधे माँ का रूप क्या सजा दिया…..”.

दर्शनार्थियों ने जमते हुए तालियाँ बजाते हुए उनका साथ दिया  |

सफ़ेद कुरता पायजामा पहेने सर पर गाँधी टोपी लगाये, एक तनिक भरी से उम्ब्रदराज सज्जन ने उठ कर, अपनी जेब से एक नोट निकला, सरदूल सिकंदर के सर के ऊपर एक-दो-तीन बार घामकर उन्होंने नोट निचे बैठे एक भक्त को थमा दिया  |

सरदूल सिकंदर ने तनिक जुक कर उन सज्जन के पाँव छूने का उपक्रम किया  |

“ये महाशय कौन है, अनिल?” मैंने कौतुहल स्वर में पूछा |

“यह श्री मनमोहन गुप्ताजी (ताउजी)  है”  अनिल मंत्रमुग्ध स्वर में बोला, यह जितना भी कार्यक्रम यहाँ चल रहा है, यह सब गुप्ता परिवार की श्रद्धा और सेवाभावना है |  मनमोहनजी इस परिवार के मुखिया है |  आपने ऍम ऍम मीठाइवाले का नाम सुना है?

“किसने नहीं सुना, भाई?” मैंने सर हिलाया | ” मालाड स्टेशन के बहार उनकी मिष्टान भंडार पर तो अपार भीड़ लगी रहती है |  मैंने बहुतेरी बार ऍम ऍम के खास लस्सी का आनंद उठाया है |  ”

“उसी ऍम ऍम मिठाई की दूकान के मालिक है ये मनमोहन गुप्ता |  अनिल ने बात आगे बताई |  अपना सर्वस्व इस गुप्ता परिवार ने पूज्य देवी माँ को समर्पित कर दिया है |  जब से देवी माँ ने इनके निवास स्थान पर आसन लगाया है, गुप्ता परिवार तो धन्य हो गया |  इस परिवार में ४० सदस्य है |  छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा सदस्य देवी माँ के प्रति कृतज्ञ है |  देवी माँ जब भी किसी पर प्रस्सन होती है तो फिर ऐसा नजारा होता है, भगत जी |  हर पंद्रह दिन के बाद यहाँ माता की चौकी होती है |  हजारो की संख्या में देवी माँ के भक्त दर्शनों के लिए खिचे चले आते है |   जरा ऊपर देखो |

मैंने गर्दन घुमाई | ” वो महिला जो हाथ में भोजन का थाल लिए है…..” अनिल तनिक मेरी तरफ जुका | ” वो श्रीमती स्नेहलता गुप्ता है”मनमोहन गुप्ताजी की धर्मपत्नी |

एक दो पुरुष और महिला सेवादार फ़ौरन आगे पहुचे |  एक चुनरी का पर्दा बनाकर श्रीमती स्नेहलता गुप्ता ने माता को भोग लगाया |

“अब भंडारा शुरू हो जायेगा”, अनिल ने हर्ष के स्वर में कहा, “ऊपर तीसरे माले पर बहुत विशाल टेरेस पर माता के प्रसाद की व्यवस्था है ! भगतजी, शादी ब्याह में जो खाना परोसा जाता है, उससे भी कही बढाकर उस भंडारे में हजारोकी संख्या में श्रद्धालु माता का प्रसाद प्राप्त करते है |  ”

“कोई पर्ची वर्ची कटनी पड़ती है क्या यहाँ?”, मैंने उत्सुक स्वर में पूछा |  “या कोई टोकन खरीदना पड़ता है?”

“आपका दिमाग ख़राब है क्या?” अनिल तनिक रूद्र स्वर में बोला |  ” भंडारे में कभी पैसा लिया जाता है क्या?” एकदम फ्री है जनाब ! चाहे जितने लोग आये, चाहे जितना खाए पेट भर के |  माता का प्रसाद है ये |  एक बात बताऊ?”

यह तनिक धीमे स्वर में बोला, “बहुत से लोग तो इसी लालच में घसे चले आते है की चलो, बढ़िया भोजन तो मिलेगा |  ”

“सत्संग की तरफ ध्यान दो” तभी एक सुन्दर सा युवक मेरे निकट से गुजरते हुए बोला “प्लीज़! बाते मत करो”

मैंने उसकी पीठ घूरते हुए अनिल से पूछा, “यह  बंदा कौन है, भैया? “…”इसका नाम …….” अनिल एकदम धीमे स्वर में बोला, ‘संजीव गुप्ता है” देवी माँ के चरणों का सेवादार |

निरंतर………

Part 8
संजीव गुप्ता दो तिन कदम आगे बढ़ने के बाद रुके |     उन्होंने तनिक घूमकर मेरी तरफ अपना रुख किया |     उन्होंने दोनों हाथ क्षमा याचना की मुद्रा में जोड़े थे |    विशिष्ट मुस्कान के साथ उन्होंने मैत्री पूर्ण निगाहों से मेरी तरफ देखा |     उनके चेहरे के भावो से लग रहा था, जैसे वह कह रहे हो, मेरी बात का बुरा लगा तो माफ़ी मांगता हु |

संजीव गुप्ता से मुझे विशेष आकर्षण और व्यक्तित्व नज़र आ रहा था |    उनके चेहरे से आत्मविश्वास और नेतृत्व के भाव जलक रहे थे |     किसी को भी अपनी और आकर्षित कर लेने की छबि ने मुझे उनका एक ही नजर में प्रशंशक बना दिया |

मैं उनके निकट पंहुचा |   “सॉरी संजीवभाई” मैंने क्षमा भरे स्वर में कहा, ” दरअसल में यहाँ के वातावरण की एक एक बात से परिचित होना चाहता था, इसलिए अनिल से कुछ जानकारी हासिल करना छठा था…”

मेरी बात पुरिभी नहीं हुई थी की, मेरी बगल से एक महिला गुजरी |   उसे तिन चार व्यक्तियों ने घेर रखा था |   वह तेज कदमो से चलती हुई, सीधी सीढियों की तरफ बढाती चली जा रही थी |

“ये रीना रॉय है” संजीव गुप्ता ने एकदम फुसफुसाते स्वर में कहा, “फिल्म स्टार ! पहचाना?”

ओह, हा! में जैसे कही खो गया था |   “ठीक कहा आपने” मैं सोच रहा था, इस महिला का चेहरा जाना पहचाना क्यों लग रहा है”

“सुनिए, भक्त जी”, संजीव गुप्ता अत्यंत व्यस्त स्वर में बोले, “देवी माँ के बारे में, यहाँ की ‘माता की चौकी’, यहाँ आनेवाले श्रद्धालु और देवी माँ के चमत्कारों के बारे में अगर आपको कुछ जानना है, तो कल समय निकालकर मेरे ऑफिस में आईये |  आपने चामुंडा सर्कल देखा है ?”

मैंने सहमती में सर हिलाया |  चामुंडा सर्कल में आप किसी से भी ‘ग्लोबल एडवरटाइजर्स’ की बिल्डिंग पूछिए |  संजीव गुप्ता गंभीर स्वर में बोए |  बड़ी सी कांच की बिल्डिंग है |  बाहर पूज्य राधे माँ का बड़ा सा होर्डिंग लगा है | ”

“जी|”, मैं कृतज्ञ स्वर में बोला |  “में समय निकालकर कल आता हु|”

“आपका नाम?” उन्होंने मेरी आँखों में झाका  |

“भगत” में मुस्कुराया, “अभी तो नाम भगत है. दर्शनों के बाद देवी माँ का भगत हो जाऊंगा |”

“अच्छा लगा !” संजीव गुप्ता ने मेरा कन्धा थपथपाया |  “आप का यहाँ आना अच्छा लगा, आप कल आईये |  फिर में आपको देवी माँ के अनेकानेक चमत्कारों से अवगत करता हु | ”

“थेंक यू सर.” मैंने हाथ जोड़कर पूछा, “मेरा नंबर कब आएगा? ”

“जब आप पर देवी माँ की कृपा होगी |  ” संजीव गुप्ता श्रद्धा भरे स्वर में बोले, ” जब आपकी आस्था, आपका विश्वास, आपकी अंतर आत्मा सच्ची भावना से पुकारेगी, आप देवी माँ के सन्मुख खड़े होंगे |  ”

वो झटकसे मुड़े |  लम्बे उग भरते हुए सीढियों की तरफ बढे |  कुछ सेवादारो ने आदर से उन्हें नमस्ते किया |

“चलिए भगतजी..” एक सेवादार ने मुझे टोका|  “आगे बढ़ जाईये |  वह पिल्लर के पास खली जगह है | वहा बेठिये, प्लीज|”

में भीड़ में जगह बनाते हुए पिल्लर के पास पंहुचा| एक व्यक्ति ने तनिक खिसककर मेरे लिए जगह बनाई | सफ़ेद कुरता पायजमा और सफ़ेद पघडी बांधे, वह सिख संप्रदाय का युवक से लगने वाले आदमी ने एक उडती हुई दृष्टिमेरी तरफ डाली और फिर साजिंदों की तरफ देखने लगा, जो बड़े सधे हाथों से एकदम परफेक्ट ढंग से गायक की संगत्सर रहे थे|

मेरी दृष्टि उसपर जम गई|  सिख युवक ने मेरी तरफ मुह घुमाया| ” आप सुरेन्द्र है ना?”,  मैंने हर्षित स्वर में पूछा| “लाफ्टर चेलेंज, कोमेडी शो और बहुत से टीवी सीरियलों में मैंने आपको देखा है|”

उसने मुस्कुराकर सहमती में सर हिलाया|

“वह क्या बात है?” मैंने आपनी पीठ खुद थपथपाई, लकी हो भगत| इतने सारे सेलेब्रिटीज के एक साथ दर्शन हो गए |

“अभी तो देवी माँ के दर्शन बाकि है| मेरे मन के किसी कोने से आवाज आई| तब अपने आप को लकी कहना जाइज होगा |

“जय करा श्री राधे शक्ति माँ, मेरी गुडिया जैसी देवी माँ का..” मैंने अत्यंत बुलंद स्वर में उत्तर दिया, “बोल सच्चे दरबार की जय”

निरंतर……

Part 9

 

बोरीवली पश्चिम स्थित स्टेशन से सिर्फ पांच सात मिनट के पैदल रस्ते पर चामुण्डा सर्कल से थोडा आगे स्थित सोडावाला लेन में ‘श्री राधे माँ भवन’ के ग्राउंड फ्लोअर स्थित हॉल में माता की चौकी का आयोजन भव्य और धार्मिक भावना से परिपूर्ण, चल रहा था |

में गाने बजाने वाले कलाकारों के निकट बैठा तल्लीनता के साथ भक्ति संगीत में डूबा था, मगर मेरी निगाहे अपने बाई तरफ स्थित उस गलियारे की तरफ थी, जहाँ से पांचवी मंजिल को जाने की सीढिया थी|
गलियारे की निकट आधा दर्जन भर सेवादार दर्शनों के लिए जाने वाले और दर्शनोसे लौटकर आने वाली सांगत को व्यवस्थित ढंग से संभाल रहे थे |

उन सेवादारो के बीच खड़े एक सज्जन की तरफ मेरा ध्यान आकर्षित हुआ | क्रीम कलर का सफारी सूट, चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक, मगर श्रद्धा और समर्पण की झलक भी स्पष्ट नजर आ रही थी | वे दोनों हाथों से धीमे धीमे ताली बजा रहे थे | भजन – गायक के साथ साथ कुछ गुनगुना रहे थे, मगर बीच बीच में सेवादारों को कुछ निर्देश भी दिए जा रहे थे | उनकी मुश्तेदी और कर्तव्यदक्षता के कारन हॉल में काफी अनुशासन बना हुआ था |

सफारी सूट पहने व्यक्तिने मंच पर मौजूद एक कलाकार को हल्का सा इशारा किया| वह फ़ौरन उनके पास पहुंचा| सफारी सूटवाले ने कलाकार के कान में कुछ कहा| समझजाने के भाव से सर हिलाते हुए कलाकार वापिस मंच के निकट पहुंचा |  भजन गायक सिकंदर के कान में कुछ फुसफुसाते हुए कलाकार ने एक अन्य भजन गायक की तरफ इशारा किया |

में एकाएक अपने स्थान से उठा|

व्यवस्थित ढंग से बैठी संगत के बीच जगह बनाते हुए में उस सफारी सूट वाले व्यक्ति के निकट पहुँच | उनके चेहरे पर प्रश्नात्मक भाव प्रगट हुए |

“जय माता दी!”, मैंने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र स्वर में पूछा, ” आपका नाम जान सकता हूँ?”

“शिव चाचा”, वह धीमेसे मुस्कुराये | “लोग मुझे ‘शिव चाचा’ के नाम से पहचानते है | बहुत से लोग ‘जगत चाचा’ भी कहते है | वैसे मेरा नाम ‘जगमोहन गुप्ता’ है | गुप्ता परिवार का सदस्य हूँ | ‘देवी माँ’ का सेवक हूँ|

“शिव चाचाजी !”, मैंने थोडा झुक कर धीरेसे कहा, “में आपको लगभग तीन घंटे से यूँ ही खड़ा देख रहा हूँ !”

“देवी माँ की सेवा में ……” शिव चाचा समर्पण भाव से बोले, ” …साड़ी उम्र खड़ा रह सकता हूँ | एक पाँव पर भी |”

मैंने प्रशंसात्मक निगाहों से उनकी तरफ देखा, ” शिव चाचा ! में थोड़ी जानकारी हासिल करना चाहता था……….”

” आईये ….” एकदम विनम्र भाव से बोले, “क्या जानना चाहते हों?”

लगभग दस बार सीढिया चढ़ने के बाद एक तरफ बनी एक विंडो के उमरे स्थान पर थोडा उकड़ होकर हम पास पास बैठ गए |

“में जानता हूँ, आप ‘देवी माँ’ के  बारे में कुछ जानना चाहते है !” शिव चाचा ने मेरी तरफ देखा|

“में आपके बारे में जानना चाहता हूँ |” मैंने अपनी ऊँगली उनकी तरफ दो तीन बार लहराई |

“मेरा नाम जगमोहन गुप्ता है |” वह गंभीर स्वर में बोले, ” गुप्ता फॅमिली का सदस्य हूँ ! हम लोग अत्यंत भाग्यशाली है भैया, जो पूज्य राधे शक्ति माँ हमारे घर में विराजमान है | देखिये जनाब | हमारा खानदानी धंदा है | बिसनेस, इनकम इज्जत शोहरत की कोई कमी पहले भी नहीं थी, लेकिन ‘देवी माँ’ के चरण जबसे हमारे घर पड़े है , हमारे तो जैसे भाग्य खुल से गए है !”

शिव चाचा एक क्षण के लिए रुके | खरवार तनिक गला साफ़ करने के बाद पुनः बोलना शुरू किया, “आज से साढ़े चार साल पहले मैंने ‘देवी माँ’ लीला का जो अनुभव किया, वो में आपको बताता हूँ | कुछ दिनों तक मेरी तबियत थोड़ी नरम रहते रहते अचानक मेरे पेट में भीतर ही भीतर ब्लीडिंग शुरू हो गयी | फ़ौरन डॉक्टर की तरफ भागे | इमर्जन्सी ट्रीटमेंट शुरू हो गया | बहुत प्रयत्नों के बाद भी ब्लीडिंग रुक नहीं रही थी | तबियत निरंतर डाउन होती जा रही थी हम लोगो ने एक क्षण के लिए भुला दिया थी की बड़े से बड़े डॉक्टरों का भी डॉक्टर तो हमारे घर में मौजूद है | ‘देवी माँ ने ‘ हमें कुछ समाया पहले बता दिया था की सतर्क रहे | परिवार के सदस्यों ने ‘देवी माँ’ के चरणों में विनती की | फ़ौरन प्रार्थना स्वीकार हुई | ‘देवी माँ’ के आशीर्वाद से मेरे भीतर की समस्त बीमारी निकल गयी | एकदम से में स्वस्थ होने लगा | मेरी आत्मा और शरीर के तमाम रोग नदारद हो गए | में कुछ ही दिनों में एकदम स्वस्थ हो गया| स्वस्थ ही नहीं हो गया, उम्र के लिहाज से पहले से बी ज्यादा तरोताजा और तंदुरुस्त फील करने लगा हूँ | ‘देवी माँ’ की दृष्टी मात्र से प्रत्येक रोग का निदान हो जाता है, यह मेरा विश्वास भी है और दावा भी| … बोले ‘राधे शक्ति माँ’ की ………”


“जय !” मैंने दोनों हाथ आसमान की तरफ तान दिए !

(निरंतर …………)  

Part 10

 

 
शिव चाचा ने हौले से मुस्कुराकर मुझे आश्वस्त रहने का संकेत दिया |  मेरा कन्धा थपथपाया कर  वह  फ़ौरन  निचे  गलियारे  के  पास  अपने  विशिष्ठ स्थान पर जा खड़े हुए मुश्तेद मुद्रा में ! अपनी डयूटी को जिस तन्मयता और लग्न से निभा रहे थे, मैंने मन ही मन उन्हें सलूट किया |

में जिस विंडो की थोड़ी उमरी हुई जगह पर उकडू होकर बैठा था वह से पुरे हॉल का जायजा भी लिया जा सकता था और पहली मंजिल की तरफ जा रही सीढियों पर खड़े श्रधालुओं को निकट से देख सकता था |  लाइन आगे न सरकती देख एक अधेड़ से सज्जन, जिसका शरीर थोडा भारी था, शायद थक से गए थे, वही मेरे निकट फर्श पर बैठ गए |

“आप लाइन में है क्या?”, उन्होंने व्यग्र स्वर में पुछा |

“नो!”, मैंने इनकार में सर हिलाया, “में कुछ आराम से साथ, कुछ जानकारी लेने के बाद, थोड़ी भीड़ कम होने के बाद दर्शन करना चाहता हूँ !”

“फिर तो तीन बजेंगे बच्चू !”, उन्होंने सर हिलाया, “संगत ने अभी तो आना शुरू किया है ! और वह तुम जानकारी के बारे में कह रहे थे | क्या जानकारी चाहते हो पुत्तर ! में यहाँ वर्षो से आ रहा हूँ | नियमित रूप से आ रहा हूँ | बिना नागा आ रहा हूँ |”

“में सोच रहा था ….. ” में विचारपूर्वक स्वर में बोला, ” इतना भव्य आयोजन, इतना इंतजाम, इतनी व्यवस्था, हर पंद्रह दिन के बाद करना कोई मामूली बात हो नहीं है | बहुत सारा खर्चा होता होगा इन सब पर!”

“ठीक जा रहे हो |”, उसने सहमती में सर हिलाया, ” अभी तो पहली मंजिल भी नहीं पहुचे हो……”

“भगत!” मैंने उसकी बात पूरी की, भगत नाम है मेरा ! दर्शनों के लिए पहली बार आया हूँ |”

“भगत जी !”, वह उत्साह भरे स्वर में बोले, ” आपने रोड से लेकर यहाँ तक खड़े सेवादारों की संख्या का अनुमान लगाया है ?”

“यही कोई ….” में सिर खुजलाया, ” बीस पच्चीस..!”

“सौ  के करीब है !” उसने भवे माथे पर ले जाते हुए कहा, ” लेडिज और जेंट्स सेवादा ऊपर दरबार में ‘देवी माँ’ की गुफा से लेकर, हर मंजिल पर दो-दो, तीन -तीन सेवादार ! आप क्या समझते हो इनको कोई तन्खवाह मिलती है?”

मैंने प्रश्नात्मक निगाहों से उसकी तरफ देखा |

“ये सेवादार है !” वह एक एक शब्द पर जोर देते हुए बोले, ” अपनी मर्ज़ी से, अपने काम धंदे छोड़कर यहाँ मात्र सेवा के लिए आते है | इनको पगार नहीं मिलती | लेकिन इनको जो मिलता है, वह दुनिया भर की सभी पगारों से कही ज्यादा है | भगत जी ! सभी को दर्शन करवाने के बाद जब ये ‘देवी माँ’ के सन्मुख होते है और ‘पूज्य राधे शक्ति माँ’ की दया मय दृष्टी इन सेवादारों पर पड़ती है तो उससे अधिक परम आनंद कही नहीं है | किसी चीज़ में नहीं है ! उसके बाद इनको भंडारा मिलता है| भंडारे से याद आया, आपको मालूम है तीसरी मंजिल पर दाई तरफ स्थित टेरेस पर विशाल भंडारे का इन्तेजाम रहता है |”

मैंने इनकार से सर हिलाया |

“गिनो……. ” उन्होंने अपना दाहिना हाथ आगे करते हुए अंगूठे से उँगलियों के पौर दूना शुरू किया, “पाच – छह प्रकार का सलाड और अचार, तीन-चार प्रकार की सब्जी, दाल, कढ़ी, बूंदी का रायता, कभी पाव-भाजी तो कभी पूरी, बेसन की तंदूरी रोटी, गेहू की रोटी, चावल, पुलाव, पिज्जा, भेलपुरी, डोसा, सेवियों की खीर, आईसक्रीम, फलूदा, तीन-चार मीठाइया, फ्रूट सलाड, गुलाब जामुन, जलेबी, रबड़ी, हलवा, चना…………..”

“बस, भाईसाहब, मेरे मुह में सचमुच पानी आने लगा, आप तो किसी भव्य शादी में परोसे जानेवाले मेनू का वर्णन कर रहे हो….”

“यह सब तीसरे माला पर स्थित भंडारे में मिलता है, मेरे बच्चे !” वह श्रद्धा पूर्वक स्वर में बोले, “और सब ‘देवी माँ’ की कृपा से होता है | आप क्या समझते है, गुप्ता परिवार इसके लिए कोई चंदा लेते है? ‘देवी माँ’ की अपार दया से ये सब गुप्ता परवर आयोजित करता है और वह भी निःस्वार्थ !

मैंने हैरानी से सिर हिलाया |

“भगत जी!” वह दोनों हाथ उठाकर छत की तरफ देखने लगा, ” आप नहीं जानते ‘देवी माँ’ की लीला क्या है ! ‘देवी माँ’ कभी उपदेश या प्रवचन नहीं देती ! मालूम है ? वो कभी डिमांड भी नहीं करती ! वो किसी को कुछ करने न करने के लिए रोका – टोका नहीं करती | ‘देवी माँ’ की गुफ़ा में, जैसे ही कोई माँ का सेवक प्रवेश करता है, माँ उसकी तरफ निहारती है, उनकी दिव्य दृष्टि सेवक के भीतर पहुँच कर उसकी तमाम शंका का फ़ौरन भाव लेती  है | जब तक आप ‘देवी माँ’ के सन्मुख पहुचते है | आपकी समस्योंका निदान हो चूका हुआ होता है |”

“बोलो पूज्य ‘राधे शक्ति माँ’ की…….” सीढीयों के ऊपर मोड़ पर खड़े सेवादार ने उसे उठानेका इशारा किया|

“जय!”, वह सज्जन तत्परता से उठे |  कतार आगे सरकी | मोड़ मुड़ते ही वह सज्जन मेरी दृष्टी से ओंझाल हो गए |

में भीतर ही भीतर एक आसिम शांति और अपने आपको हल्का महसूस करने लगा था |….

(निरंतर….)

Part 11

 

 

परम  श्रधेय  पूज्य  श्री  राधे  शक्ति  माँ  को  हाज़िर  नाज़ीर  मान  कर , जो  कहूँगा  – सच  के  सिवा  कुछ  नहीं  कहूँगा  – सरल  कवी 

 

गायक  सरदूल  सिकंदर  ने  जोरदार  जयकारा  लगवाया , “जयकारा  मेरी  गुडिया  जैसी  प्यारी  ‘राधे  माँजी ’ दा….”

 

“बोल  सांचे  दरबार  की  जय !” हॉल  में  मौजूद  संगत ने  छत  हिला  देने  वाले  बुलंद  स्वर  में  उत्तर  दिया |

 

सरदूल  सिकंदर  ने  अपना  गायन  समाप्त   कर  बैठे ने  के  लिए  निचे  ताका. मंच  संचालक  ने  माइक  लेकर  कुछ  कहना   चाह , तभी  शिव  चाचा  मंच  संचालक  के  निकट  पहुंचे |  मंच  संचालक ने  उनका  इशारा  समझा  और  माइक  उन्हें  थमा  दिया|

 

हॉल  में  सन्नाटा  सा  छा गया | शिव  चाचा के  हाव -भाव  प्रदशित  कर  रहे  थे  की  वह  कोई  महत्त्वपूर्ण  सूचना  देने  वाले  थे  |

 

मैंने  अपना  सर  विंडो  के  ग्रिल  से  सटा लिया  और  शिव  चाचा की  बात  सुनाने  को  सचेत  हो  गया |

 

“जयकारा श्री  राधे  शक्ति  माँ जी ’ दा !” शिव  चाचा  ने  सादे  मगर  धीमे  से  स्वर  में  जयकारा  लगवाया |

 

“बोल  सांचे  दरबार  की  जय !” अपने  दोनों  हाथ  उठाकर  सेवादारो  के  संग  संग  संगत  ने  जयकारा पूरा  किया |

 

“प्रिय  माता  के  पुजारियों !” शिव  चाचा गंभीर  स्वर  में  बोले , “पूज्य  देवी  राधे  शक्ति  माँ’  के  दर्शनों  के  लिए  हमने  ह़र पंद्रह  दिन  बाद  यानि  एक  शनिवार  छोड़कर  अगले  शनिवार  , यानी  महीने  में  दो  दिन  निश्चित   किये  थे | यह  सिलसिला  पिछले  कई  सालो से  चला  आ  रहा  है |  माँ  राधे  शक्ति  माँ  की  उपासना  पूजा  अर्चाने  करने  वालों  की  संख्या  निरंतर  बढती  जा  रही  है !”

 

हॉल  में  तालिया गूंज  उठी |

 

“हर  पंद्रह  दिनों  बाद  यहाँ  लगने  वाले  भक्तो  के  मेले  में  आज  में  हर्ष  के  साथ  चर्चा  करना  चाहता  हूँ | पिछले  अनेक  दर्शनों  वाले  दिन  हमने  पाया  है  की  निरंतर  बढती  जा  रही  संगत  के  कारन  हम  लोग  व्यापक  व्यवस्था  करने  में  थोड़ी  असुविधा  महसूस  कर  रहे  है | असुविधा  से  मेरा  क्या  मतलब  है,  में  स्पष्ट  करना  चाहता  हूँ |”

 

शिव  चाचा एक  क्षण  के  लिए  रुके |

 

थोडा  ख़ास  कर  गला  साफ़  किया  और  फिर  बात  आगे  बधाई , “ हमारे  तमाम  सेवादार , गुप्ता  परिवार  के  सदस्य, गायक  मंडली और  साजिन्दे , वॉचमेन, और  दर्शन  के  लिए  निश्चित  शनिवार की  सुबह  से  ही  तयारी  में  जुट   जाते  है | दूर  दराज  जैसे  की  दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, या  अन्य  प्रांतों से  आने  वाली  संगत  सुबह  से  ही  यहाँ  पहचानी  शुरू  हो  जाती  है | शाम  ढलते  ही  मुंबई  तथा  आस  पास  के  भक्तो  के  टोले  यहाँ  हॉल  में  एकत्रित  होने  शुरू  हो  जाते  है | पिचले  कई  महीनो  से  ‘देवी  माँ ’ के दर्शानोका  सिलसिला  देर  रात  तक  चलता  रहता  है | कई  बार  तो भोर  तक  हो  जाती  है |”

 

सांगत  ने  करतल  ध्वनि  से  अनुमोदन  किया |

 

“जय  माता  दी ” शिव  चाचाने हात  उठाकर  शांत  रहने  का  इशारा  किया | हॉल  में  फिर  हल्का  सा  सन्नाटा  च  गया |

 

‘अब …” शिव  चाचा  ने  तनिक  ऊँचे  स्वर  में  कहा , “ हमने  निर्णय  लिया  है ..की  संगत  को  पंद्रह  दिन  की  बजाय सात दिन  के  बाद  यानिकी  प्रत्येक  शनिवार  को  पूज्य श्री  राधे  शक्ति  माँ  के  दर्शनों  का  लाभ  प्राप्त  होगा |”

 

उपस्थित  संगतने  हर्षके  साथ  जो  तालिय  बजने  शुरू  की  … वो  कई  देर  तक  निरंतर  बजती  रही |

 

“लेकिन ….”  शिव  चाचा ने  फिर  शांती  बनाये  रखने  के  लिए  हाथ  हिलाते  हुए  कहा , “अब  दर्शनों  के  लिए  व्यवस्था  में  थोडा  परिवर्तन  किया  गया  है | आप  लोगोको  हॉल  में  प्रवेश  करने  से  पहले  प्रत्येक  दर्शनार्थी  को  एक  कार्ड  दिया  गया  है |”

 

अनेक  भक्तोने  अपना  कार्ड  हवा  में  लहराया |

 

“बिलकुल  ठीक !” शिव  चाचाने  एक  उंगली  ऊपर  की, “अब  मेरी  बात  गौर  से  सुनिए | ये  कार्ड  अलग  अलग  रंग  के  है | लाल, नीला, और  पीला, माता  के  भक्तो ! हमने  व्यवस्था  ये  की  है की  अब  प्रत्येक  शनिवार  को  एक  रंग  के  कार्ड  वाले  भगत  ही  दर्शनों  का  लाभ  प्राप्त  कर  पाएंगे|”

 

हॉल  में  तनिक  निराशाजनक  “होssss …..” की  आवाज  सुनाई दी |

 

“देखिये !  यह  व्यवस्था  आप  लोगो  की  सुविधा  के  लिए  ही  है !” शिव  चाचा  तनिक  जोर  देकर  बोले , “मसलन  हम  इस  शनिवार  को  यह  घोषणा  करेंगे  की  आनेवाले  शनिवार  को  किस  कलर  के  कार्ड  की बारी  है ! मान  लीजिये  नीले  रंग  वाले  कार्ड  वालो  की  घोषणा  हुई  तो  प्लीज़ …. उस  दिन  नीले  रंग  वाले कार्ड  वाले  ही  दर्शनो  के  लिए  आये | लाल  या  पीले  रंग  के  कार्ड  वालों  को  हॉल में  प्रवेश  करने  की  अनुमति  नहीं  मिलेगी | उसके  अगले  शनिवार  को  नीला  और  तीसरे  शनिवार  को  पीले  रंग  के  कार्ड  वालो  को  दुर्लभ  दर्शन मिलेंगे | यह  क्रम  ह़र  शनिवार  को  चलेगा |”

 

 हॉल  में  उपस्थित  संगत  में  से  कुछ  लोगो  ने  निराशात्मक  भाव  से  हाथ  लहराए |

 

“में  आपकी  भावना  को  समजाता  हूँ !” शिव  चाचा  तनिक  खेद  भरे  स्वर  में  बोले, “में  जानता  हूँ  आप  सभी  हर  शनिवार को  दर्शन  के  लिए  लालाचित  है | सज्जनों  और  देवियों  ! में  पहले  ही  निवेदन  कर  चूका  हूँ  की  यह  साड़ी  व्यवस्था  आप  सभी  श्रधालुओं  की  सुविधा  के  लिए  है | आप  तनिक  हमारे  सेवादारों की तरफ  भी  ध्यान  दीजिये| ये  सभी सेवादार और सेवादारियां निष्काम भाव  से  दोपहर  से  ही  व्यवस्था  में  जुट  जाते  है | देर  रात  तक, साड़ी  संगत  को  दर्शन  करवाने  के  बाद  इन  सबको  ‘माँ  श्री  राधे  शक्ति  माँ ’ के  दर्शन  नसीब  होते  है, तब  तक  थकान से  चूर  इन  सेवादारोकी  हालत देखकर किसीको  भी  तरस  आएगा | ये  सेवादार  ही  क्यों , यहाँ  की  व्यवस्था  सँभालने  वाले  सभी  कार्यकर्ताओं  संगमें गुप्ता  परिवार  के  सदस्यों  का  भी  यही  हाल  होता  है | इसलिए  आप सभी  ‘देवी  माँ ’ के  भक्तो  से  मेरी हाथ  जोड़कर  बिनिती  है, प्लीज़ ! प्लीज़ !! आप  इस  हम  सबकी  लाभकारी व्यवस्था  को  कामयाब  बनाना  में हमारा  सहयोग  करे | हम  लोग  शहरभर में  लगे  होअर्दिंग्स  द्वारा  सभी  को  सूचित  करेंगे  की  इस  शनिवार  किस  रंग  के  कार्ड  वाले  का  नंबर  है | इसके  अलावा भी  आप  ‘गौरव  कुमारजी  या  संजीव  गुप्ता से मोबाइल  पर  जानकारी  प्राप्त  कर  सकते  है | आप  लोगोको  यह  जानकार  भी  हर्ष  होगा  की  ‘पूज्य  श्री  राधे  माँ ’ के  लाइव  दर्शन  आप  घर  बैठे  भी  प्राप्त  कर सकते  है | लाखो  ‘पूज्य  श्री  राधे  माँ ’ के  अन्यन्य  भक्त www.globaladvertisers.in वेबसाइट  पर  लॉग इन  करके  यह  लाभ  प्राप्त  कर  रहे  है |

 

जिन  लोगो  को  कार्ड  नहीं  मिला  वह  गौरव  कुमारजी  या  फिर  हमारे  अन्य  सेवादारों से  कार्ड  प्राप्त  कर  सकते  है |

 

आईये  ! हम  फिर  माता  के  भजनों  का  आनंद  ले ! जिक्र  मेरी  आनंदमई ‘पूज्य  श्री  राधे  शक्ति  माँ ’ का ”

 

“बोल  सांचे  दरबार  की  जय …..!” संगत  ने  उत्साहपूर्वक  जिक्र  लगाया |

 

 

(निरंतर …..)